चिंताजनक: उत्तराखंड में पहाड़ की 35 धान प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर

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पहाड़ की 35 से अधिक धान प्रजातियां कम लागत और अधिक उपज की होड़ में हाईब्रीड के मुकाबले पिछड़कर विलुप्ति के कगार पर हैं। इनमें कई औषधि के तौर पर मशहूर हैं तो कुछ विपरीत हालात में भी लहलहाती थी। इन्हें बचाने के लिए वन अनुसंधान केंद्र ने अपने सेंटरों पर कुछ प्रजातियों को संरक्षित किया है।

पहाड़ की परिस्थितियों के साथ खेती किसान का प्रारूप तेजी से बदल रहा है। ऐसे में उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में उगाई जाने वाली धान की 35 से अधिक प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर आ चुकी हैं।

यह धान कम पानी और ओले की मार के बावजूद पूरी पैदावार देते थे तो कुछ का सेवन औषधि के तौर पर होता आया है। मगर अब इनके बीज पहाड़ी क्षेत्रों में खोजना बड़ी चुनौती है। ऐसे ही अद्वितीय गुणवत्ता बीजों को बचाने के लिए 1986-87 से प्रदेश में बीज बचाओ आंदोलन जारी है।

विलुप्ति की कगार पर ये 35 धान प्रजातियां
बासमती नागणी, रिख्वा, लुवाकाट, थापा चीनी, झैल्डू, लठमार, साठी, कफलिया,  नागमती, ध्यासू, झुमक्या, हंसराज, रत्वा, पुखरैली, भलों, उखड़ी बासर, मुजिलू, उन्तौली, खुशामती, कलपारिया, न्यूरी, देहरादून बासमती, बाड़ाहाटी, जड़ख्या, पल्योपार, भेटकलों, कालामुखड़ी, पडियारी, ज्वाटू, उखड़ी धान, सिजल, बग्वै, अल्मोड़ी, कांगुड़ी आदि हैं।

गठिया और डायबिटीज में बेहद कारगर है साठी
पर्वतीय इलाकों में उगाए जाने वाले धान की अपनी खासियत होती है। साठी धान गठिया और डायबिटीज रोकने में मददगार है तो कफलिया महिलाओं की समस्याओं के इलाज में कारगर है। कुछ धान की प्रजातियों में विटामिन ए की उपलब्धता भी है।

जो जहां रहता था, कुदरत ने उसके हिसाब से भोजन दिया। वैसे ही पर्वतीय इलाकों की 35 से ज्यादा धान की प्रजातियां पोषक के साथ रोगरोधी हैं। यहां लोगो के खानपान की आदतों से मिलती है। मगर आज यह विलुप्ति की कगार पर हैं। इनके बढ़ने के लिए अनुकूल माहौल बने, इस पर रिसर्च होनी चाहिए।
विजय जरधारी, संयोजक, बीच बचाओ आंदोलन टिहरी 
पर्वतीय क्षेत्र में विलुप्ति के कगार पर धान की प्रजातियों के बीज वन अनुसंधान केन्द्र में सहेजे हैं। यह प्रजातियां क्षेत्र विशेष में सालों में विकसित हुई हैं। वहंां मनुष्य के साथ-साथ हर जीव की सेहत के लिए महत्वपूर्ण हैं। यह परिस्थितिक तंत्र का हिस्सा हैं। इन प्रजातियों को बचाने के लिए तुरंत ठोस प्रयास किए जाने की जरूरत है।
संजीव चतुर्वेदी, मुख्य वन संरक्षक, वन अनुसंधान केन्द्र हल्द्वानी