जंगलों को आग से बचाने के लिए संस्थाओं ने विभाग को चेताया।

 


भानु प्रकाश नेगी,देहरादून


पिछले साल उत्तराखंड में 1244 हेक्टेयर जंगल जल कर खाक हो गये थें। वनों में लगने वाली आग से होने वाली अरबों रूपये की वन संम्पदा व जंगली जानवरों को पंहुचने वाले नुकसान को देखते हुए तमाम सामाजिक संगठनों व संस्थाओं ने अभी से विभाग को चेताना शुरू कर दिया है।इन्होंने चेताया है कि हर बार वन विभाग आग को रोकने के लिए दावे तो करता है लेकिन धरातल पर कुछ दिखाई नहीं देता है। प्रसिद्व पर्यावरणविद् व मैती संस्था के संस्थापक कल्याण सिंह रावत का कहना है कि फायर सीजन शुरू होते ही जंगलों की आग से हर साल अरबों रूपये की वन संम्पदा नष्ट हो जाती है। हॉलाकि केन्द्र सरकार द्वारा जंगलों की आग को काबू करने के लिए करोंड़ों रूपयें हर साल वन विभाग के दिये जाते हैं,लेकिन फिर भी यहां जंगलों में आग रूक नहीं पाती है।

नियो विजन संस्था के संस्थापक गजेन्द्र रमोला का कहना है कि वनों की आग को बिना जन सहभागिता व जन जगरूकता के नहीं रोका जा सकता है।इसके लिए हर स्कूल में छात्र छात्राओं को वनाग्नि से बचानें के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाये जाने आवश्यक है,साथ ही ग्रामीण स्तर पर स्थानीय लोगों की सहभागिता आवश्यक है।उन्होंने विभाग को चेताते हुए उन्होंने कि हर साल की तरह वन विभाग की तैयारियां धरी की धरी रह जाती है,लेकिन विभाग को जनहित में कुछ ठोस प्रयास करने की आवश्यकता है।


गैरतलब है कि मैदानी क्षेत्रां के जंगलों में लगने वाली आग,पहाड़ी क्षेत्रों में लगने वाली आग में बहुत अंतर होता है।जिसके लिए विभागों के पास कोई तैयारी नहीं होती है।केन्द्र सरकार द्वारा स्थानीय लोगों का जंगलों से अधिकार छीन जाना लोगों में जंगलों के प्रति उदासीनता बढती जा रही है।जिससे लोगों में आग बुझाने में सहभागिता न के बराबर हो गई है। आग बुझाने की जिम्मेदारी वन विभाग पर आ जाती है और वन विभाग में प्रयाप्त कर्मचारी नहीं होते है।
जनपद चमोली निवासी ग्रामीण मोहन रावत का कहना है हमारा गांव चीड़ के जंगल के पास है,यहां हर साल जंगल में अचानक आग लग जाने से काफी नुकसान हो जाता है कई बार जंगलों की आग गांव तक पंहुच जाती है जिसके कारण ग्रामीणों को जान व माल का खतरा हो जाता है।वन विभाग वनों की आग को रोकने का दवा तो करता है,लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही होती है।
पौडी पैठाणी निवासी भगत सिंह का कहना है कि जंगलों में आग लगने कारण फायर सीजन से पहले वन विभाग की अचित तैयारी का न होना है। चीड़ के वनों की अधिकता के कारण जंगलों की आग खतरनाक स्तर तक पंहुच जाती है।जिसे बचाने का धरतल पर कोई खास प्रयास विभाग द्वारा नहीं किया जाता है।
पहाड़ों में जंगलों में लगने वाली आग का प्रमुख कारण चीड़ के बड़ते जंगल है।चीड़ के जंगलों के पनपने से पंरम्परागत बांज के जंगल खत्म हो रहें है,जिसके कारण प्राकृतिक जल स्रोत सूखते जा रहें है। वनों की आग विभाग के उचित प्रबंधन और जन सहभागिता न होने के कारण हर साल बढ जाती है।
मुख्य वन्य संरक्षक आर के मिश्र की माने तो जंगलों में फायर सीजन में लगने वाली आग को रोकने के लिए वन विभाग हर तरह से तैयारियां कर चुका है।जिसमें स्थानीय लोगों के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाये जा रहें है, हमने वाहनों पर वानाग्नि को रोकने के लिए पोस्टर लगाये है। जिससे आम जनता जागरूक हो सकें।पिछले सालों की तरह जंगलों में आग न भड़के इसके लिए हमने अभी से काफी प्रयास किये है।