युवा उत्तराखंड 17 साल में क्या खोया क्या पाया?

9 नवम्बर 2000 को अभिभाविजित उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड राज्य की स्थापना की गई।विश्व के आंन्दोलनों में चर्चित उत्तराखंड राज्य का आन्दोलन आज इतिहास के स्वार्णिम पन्नों में अंकित हो चूका है।कुल 13 जिलों वाले इस राज्य में 9 पहाडी जिले और 4 मैदानी क्षेत्र से है। विषम भौगोलिक भू भाग वाले प्रदेश में इस राज्य की स्थापना का मुख्य कारण उत्तर प्रदेश जैसे विशाल प्रदेश में पर्वतीय जिलों की अपेक्षा थी जिसके लिए बाद में अभिवाजित उत्तर प्रदेश में पर्वतीय विकास मंत्रालय बनाया गया था। लेकिन इसके बावजूद भी पर्वतीय जिलों की अपेक्षा होती रही।
उत्तराखंड राज्य अपनी स्थापना के 17 साल पूरे कर अब किशोरावस्था में पंहुच गया है। प्राकृतिक रूप से बेहद खूबसूरत,और अपार जल संपदाओं को अपने में समेटे इस राज्य में भले ही आय के अन्य प्राकृतिक संसाधनों अधिक न हो लेकिन तीर्थाटन, पर्यटन समेत जल संसाधनों के कारण ऊर्जा के क्षेत्र में अपार संभावनायें है।
इस बात को आज के समय में लगभग सभी लोग ( पत्रकार,समाजसेवी,बुद्विजीवी,राजनेता,युवा,नौकरशाह) मानते है कि उत्तराखंड राज्य निमार्ण का जो उददेश्य था उसके अनुरूप वो काम नही हो पाया जिसे होना चाहिए था। पिछली सरकारों में निजी स्वार्थ की राजनीति ने प्रदेश ही को ताक पर रख कर खुद की ज्यादा चिन्ता की। जिसके कारण आज विकास की रफतार उस गति से नही चल पा रही है, जिस गति से चला चाहिए था।
प्रदेश का दुर्भाग्य यह रहा कि इस प्रदेश को हिमाचल प्रदेश के वाई.एस.परमार की तरह जमीनी मुखिया नही मिल पाया जो कार्यस्थल में जाकर जिम्मेदार लोगो की मीटिंग के साथ-साथ कार्य योजना की समय सीमा तय कर सके। दूसरा सबसे बडा का कारण केन्द्र और राज्य में अलग- अलग पार्टीयों की सरकारें रही है। जिसके कारण राज्य सरकारों का बार-बार कार्य योजनाओं के लिए बजट का रोना रहा है।
17 सालों में प्रकृति की मार झेलता उत्तराखंड धीरे-धीरे अपने को उभारने की कोशिस तो कर रहा है। लेकिन जिस गति से यहां के लोगों की मदद होनी चाहिए थी उसे निजि हित में दर किनार कर दिया गया। दैवीय आपदाओं से असुरक्षित महसूस कर रहे लोग लगतार मैदानी क्षेत्रों की ओर पलायन कर रहें है।राजनीतिक अस्थिरता के 17 साल में 8 मुख्यमंत्री का बनना उत्तराखंड के विकास में सबसे बडें रोडे अटका गया। शहरों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा,स्वास्थ्य,सडक,की हालत चिंताजनक होने से भी पलायन तेजी से होता जा रहा है। जिससे सीमांत जिलों के गांवों के खाली होने से देश पर सामरिक दृष्टि से खतरा पैदा हो रहा है। साथ ही राज्य की बोली भाषा का अभी तक संविधान की आठवी अनुसूची में शामिल ना हो पाना बोली भाषा के पलायन का कारण बन चूका है। जो आने वाली पीढी के लिए गंभीर सांस्कृतिक चिंन्ता का विषय है।
राज्य स्थापना के 17 साल बाद भी राजनीतिक पार्टीयों का गैरसैण पर स्थित का साफ न होना भी राज्य की बदहाली का एक कारण है। पर्यटन और तीर्थाटन के सहारे चलने वाला प्रदेश आज भी ठोस नीति और जमीन तौर पर कार्ययोजना और उसको धरातल पर उतारने की राह ताक रहा है।
ऐसा नही है कि उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद कोई विकास कार्य नही हो पाया है। लेकिन राज्य के आन्दोलन कारी शहीदों के सपनों का उत्तराखंड आज भी राह ताक रहा है।जिसे उत्तराखंड के राजनेता भी परदे पीछे स्वीकारते रहे है।
राजनीतिक उठा पठक से परेसान उत्तराखंड के जनमानस ने पहली बार प्रदेश की भाजपा सरकार को 2017के विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत से नवाजा है। वर्तमान सरकार से भारी अपेक्षा लगाये उत्तराखंड की जनता के लिए केन्द्र सरकार द्वारा 12 हजार करोड़ की लागत से बनने वाली आॅल वेदर रोड़, और ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेलमार्ग और ऋषिकेश में विश्व स्तरीय देश का सबसे बडा कन्वेन्स सेन्टर का निमार्ण का तोहफा दिया गया है। राज्य सरकार के अनुसार इन सभी योजनाओं पर कार्य शुरू हो चुका है। जो उत्तराखंड के लिहाज से मील का पत्थर सावित होगा। यदि ये सभी योजनायें धरातल पर उतरी तो कुछ हद तक पहाडों की हालत में सुधार हो सकता है।
स्कूलों और काॅलेजों में बढती युवाओं की भीड़ विकारल होती बेरोजगारी को दर्शाती नजर आ रही है।राज्य सरकार के पास सीमित संसाधनों के बीच इन युवाओं को स्वरोजगार की ओर मोड़ना पिछली सरकारों के लिए टेडी खीर सावित हुई है। वर्तमान सरकार को इस दिसा और दसा पर गंम्भीरता से सोचने की अति आवश्यकता है।
किशोर से युवा अवस्था में पंहुचे उत्तराखंड में स्वरोजगार के क्षेत्र में अभी अपार संभावनायें है। जिसमें स्यंम सेवी संस्थाओं और सरकारों को मिलकर जमीनी तौर पर काम करने की अतियंन्त आवश्यकता है जिससे बेराजगार युवाओं को रोजगार के साथ साथ प्रदेश की आर्थिकी में भी सुधार होगा। साथ ही देश के अन्य राज्यों की तरह उत्तराख्ंाड आन्दोलनकारी शहीदों के सपनों की पहली पसंद गैरसैण को राजधानी में बनाना होगा तभी पहाडी जिलों से पलायन कम हो सकेगा। 17 साल में पहली बार पलायन आयोग का गठन कर वर्तमान सरकार ने सकारात्मक पहल का परिचय दिया है।केन्द्र सरकार और हिमाचल प्रदेश का अनुभव लिए पूर्व महानिदेशक वन एवं सचिव डां शरद सिहं नेगी को पलायन आयोग का उपाध्यक्ष बनाये जाने से पहाडी जिलों से हो रहे पलायन पर निश्चित तौर पर कुछ हद तक रोक लग पायेगी।
अब जरूरत है पिछल खटटे मीठे अनुभवों को साथ लेकर युवा उत्तराखंड को नये सिरे से विकास करने की जिसमें सभी वर्ग के उत्तराखंडीयों का सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने। तभी उत्तराखंड सही मायने में समृद्वि एवं संम्पन्न राज्य बन पायेगा।

    -भानु प्रकाश नेगी