वो रात भर घुमा पर उसे एक सुई लगाने वाला न मिला ! तो खुद बन गया डॉक्टर

डाॅक्टर अजीत गैरोला की असली कहानी उन्ही की जुबानी

सन् 1950 में मेरी मां बीमार पड गई उनको तकलीफ थी मेरे पिताजी के पास एक सिरीज और एक इंजेक्सन था।वो रात पौड़ी में बर्फिली रात थी वो पूरे शहर में घूमें कि कोई आदमी मेरी चिल्लाती करहाती बीबी को एक सुई लगा दे पूरी रात वह शहर में धूमते रहे लेकिन शुबह पांच बजे तक उन्हें कोई डाॅक्टर नही मिला बाद में टीवी और किडनी फेल होने के कारण लम्बे समय तक अस्पताल में रहना पडा और वह मानसिक रोगी भी हो गयी थी और अंत मै उन्हें अस्पताल में ही दम तोड़ना पड़ा।

 

बस उसी समय मेरे पिताजी ने तय कर दिया कि में अपने बच्चों को डाॅ. बनाउंगा। उसी का परिणाम है कि मै और मेरी चार बहिनें डाॅक्टर बन गयी। उस एक रात ने हमारी जिन्दगी बदल दी उसके बाद हमने डाॅक्टरी पेसे के अलावा कभी सोचा ही नही।डाॅक्टरी के अलावा मेरे दिमाग में कोई बात आती ही नही आज जो मै यह पेसा कर रहा हूॅ । वह पैसा कमाने के लिए नही है। मरीजों के प्रति इतनी संवेदना इसलिए है कि मैने अपनी मां को तड़पते हुऐ देखा है। मैने अपनी मां को किडनी फेल होने से मरते हुऐ देखा है। जब मेरी मां बीमार पडी थी तब में ढाई साल का था मुझे उठाकर मेरी नानी के घर जोशीमठ भेज दिया गया था क्योकि मेरी मां को टीबी हो गया था। मुझे लेने मेरे पिताजी तब आये जब में 6 साल का था। लोग मुझे कहते है कि तुम मरीज के प्रति इतनी सहानभूति क्यो रखते हों ? मैं उन्हें कहता हूं कि इन्ही सहानुभूति के बल पर मै आज इस मुकाम पर हूॅ। क्योंकि मैं इनकी पीडा को महसूस करता हूूॅ। जब मेरी मां की मृत्यु हुई तब पिताजी की उम्र 42 साल थी तब भी उन्होनें दुबारा शादी नही कि हमें अपना पेट काट कर मुकाम तक पंहुचाया।