उत्तराखंड मैं क्या रहा कांग्रेस की बड़ी हार का कारण, जाने इस खास रिपोर्ट मैं !

2014, 2017 और अब 2019 में भी कांग्रेस को कड़ी हार का सामना करना
पड़ा है। इन पांच सालों में कांग्रेस का प्रदर्शन बद से बदत्तर रहा जिसका
नतीजा आज सबके सामने है। जहां देश में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस
कही जाती थी तो अब वही विपक्ष अपने अस्तित्व को भी खो चला है। अब न कहने
को पूर्ण विपक्ष है और ना ही वो ताकत और ना ही वो जज्बा अब कहीं नजर आता
है।देश में 70 साल तक जिस पार्टी ने राज किया वो पार्टी आज डूबने की
कगार पर है। उत्तराखंड में ही नहीं पूरे देश भर में कांग्रेस अब कहीं
मुंह दिखाने लायक नहीं रह गई। 2014 की प्रचंड जीत ने पहले जहां कांग्रेस
की कमर तोड़ दी थी तो वहीं अब 2019 की सुनामी से कांग्रेस कहीं उड़ चली
है। राज्य की बात करें तो यहां इस बार भी पार्टी के हाथ खाली रहे।
हालांकि उनके अपने मानते हैं कि कहीं तो चूक हुई है। जिसपर आत्मसात करना
आवश्यक है।

विलुप्ति के मुहाने पर खड़ी कांग्रेस को प्रदेश में गुटबाजी ले
डूबी। हालांकि कांग्रेस ने कभी इस बात को नहीं स्वीकारा लेकर यह बात किसी
से नहीं छुपी है। आइए एक नजर डालते हैं उन मुद्दों पर जो रही पार्टी की
हार का सबसे बड़ा कारण।

—क्षत्रपों के बीच वर्चस्व की अंदरखाने छिड़ी रहने वाली जंग

— पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत खेमे, प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह व नेता
प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश की जोड़ी के बीच तनातनी

— यह तनातनी आड़े आती रही पार्टी की एकजुटता के सामने

— भाजपा की चुनौती पर साथ मिलकर निपटने के बजाय एकदूसरे की टांगखिंचाई पर
रही ज्यादा रूचि।

— प्रत्याशियों के चयन से लेकर चुनाव प्रचार तक रही अंदरूनी सियासत

हालांकि पार्टी के नेताओं ने अपनी कमी जानते हुए भी उसे कभी
स्वीकार नहीं किया। और आज भी पार्टी अपनी कमी से इंकार करती रही। लेकिन
जो हुआ वो जगजाहिर है। अभी भी पार्टी गुटबाजी को नकार रही है। और इस बार
हार की वजह मशीनों का जादू बता रही है।
लगातार पांच सालों में हुए चुनावों में देखें तो कांग्रेस
को जनता ने स्वीकार नहीं किया है। और अब तो मोदी सुनामी से कांग्रेस
पार्टी को और भी मुश्किलें हो गई हैं। लेकिन इन सब मुश्किलों से कांग्रेस
तभी पार पा  सकती है जब वो संगठनात्मक रूप से और पहले अपनों से पार पा
सके।

-पूर्णिमा मिश्रा