यू-सैक ने आयोजित की अंतरिक्ष आधारित विकेंद्रीकृत नियोजन के लिए सूचना समर्थन पर कार्यशाला।

 

अंतरिक्ष आधारित विकेंद्रीकृत नियोजन के लिए सूचना समर्थन विषय पर आयोजित कार्यशाला।


हिमालय के सर्वांगींण विकास एवं पर्यावरण संतुलन के लिए अंतरिक्ष आधारित सूचना तकनीकी का महत्वपूर्ण योगदान है, जिसके लिए राज्य में कार्य कर रहे सभी राष्ट्रीय व राजकीय संस्थानों को आपस में अधिक सामंजस्य व साझे प्रयास करने होंगे, यह बात राज्य के मुख्यमंत्री  त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केन्द्र (यू-सैक) द्वारा आयोजित अंतरिक्ष आधारित विकेंद्रीकृत नियोजन के लिए सूचना समर्थन विषयक पर एक दिवसीय कार्यशाला का उद्घाटन करते हुये कही।

मुख्यमंत्री  त्रिवेन्द्र रावत ने कहा कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी वर्तमान में आम जन मानस की पहली प्राथमिकता बन गयी, उन्होंने कहा कि आज हमारा देश अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में विश्व के उन चुनिंदा देशों में स्थान पा चुका है जो कि अपने स्पेश कार्यक्रमों के अतिरिक्त अन्य बडे राष्ट्रों की भी सहायता करता है। मुख्यमंत्री  ने कहा कि उत्तराखण्ड अंतरिक्ष उपयोग केन्द्र हमारे प्रदेष के विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों जैसे- जल, जंगल व जमीन का उपग्रहों के माध्यमों से आंकडे तो एकत्रित करता ही है साथ ही खास तौर पर प्रदेश की विषम भौगोलिक परिस्थितियों में, जहाॅ एक ओर ऊॅची-ऊॅची बर्फ से ढकी चोटियाॅ है वही दूसरी ओर सुन्दर मैदानी भू-भाग है तथा इन्हें आपस में जोडती गहरी नदी घाटियों के अध्ययन व इन सब के सामेकित विकास में भी बहुत ही कारगर सिद्व हुई है। हमारी नीति चाहे वे जल संरक्षण व जल संवद्र्वन के क्षेत्र में हो या फिर आपदा प्रबंधन या चार धाम विकास से लेकर सडक निर्माण तक यहाॅ तक कि टेलीमेडिसीन में भी अंतरिक्ष विज्ञान की अहम भूमिका रही है।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने यू-सैक द्वारा तैयार किये गये कैलाश सिक्रड लैण्डस्केप एटलस, एस.आई.एस.डी.पी. रिपोर्ट एवं उत्तराखण्ड जियोस्पाषियल सर्विसेज पोर्टल का भी अनावरण किया।
कार्यशाला के विशिष्ट अतिथि डॉ. धन सिंह रावत ने  कहा कि यू-सैक विष्वविद्यालयों के छात्रों एवं शोधार्थीयों हेतु कैपेसिटी बिल्डिंग प्रोग्राम के तहत राज्य के विभिन्न स्थानों पर समय-समय पर कार्यषालायें एवं ट्रैनिंग प्रोग्राम आयोजित करता है जिसमें दूरस्थ छात्र-छात्राओं एवं शोधार्थीयों को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी तकनीकी जानकारी प्रदान की जाती है। यह एक सराहनीय कार्य है। राज्य के समस्त विभागों व परियोजनाओं में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी आधारित कार्य योजना तैयार की जाये जिससे प्रदेश में प्राकृतिक संसाधनों जैसे- जल, जंगल, जमीन एवं जन सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं के निराकरण में मदद मिल सके।
इससे पूर्व केंद्र के निदेशक डॉ. एम.पी.एस. बिष्ट ने अतिथियों का स्वागत करते हुये यू-सैक द्वारा अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में किये गये कार्यों के बारे में अवगत कराया। प्रो. बिष्ट ने बताया कि यू-सैक ने पूर्व में राज्य के 32000 स्कूलों की मैपिंग कर मानचित्रीकरण तैयार किया। जिसे पूरा कर शिक्षा विभाग को सौप दिया गया है, जो कि शिक्षा विभाग के सुगम-दुर्गम के नीति निर्धारण में सहायक सिद्व हो रहा है। इसके अतिरिक्त राज्य निर्वाचन विभाग हेतु पोलिंग बूथ मैपिंग की गयी, देहरादून शहर में अतिक्रमण अभियान के तहत एम.डी.डी.ए. को पायलट प्रोजक्ट के तहत रिस्पना से प्रिंस चैक तक सन् 2000 के बाद के समस्त अवस्थापन की जानकारी सैटेलाईट मैपिंग द्वारा प्रदान की गयी। प्रो बिष्ट ने बताया कि यू-सैक द्वारा राज्य की नदियों में अवैध खनन की रोकथाम के लिये कार्य किया जा रहा है जिसमें पायलट प्रोजक्ट के तौर पर सौंग नदी के एक हिस्से का चिन्ंिहकरण कर डिजिटल मैपिंग करायी जायेगी एवं इसके रोकथाम हेतु परियोजना तैयार कर शासन को सौंपी जायेगी। जिसके इम्पलिमेंट से राज्य को हो रहे राजस्व नुकसान की भरपाई की जा सकती है। प्रो0 बिष्ट ने बताया कि कैलाष सिक्रड लैण्डस्केप एटलस में जनपद पिथौरागढ के 40 से अधिक भू-स्थानीक मानचित्र तैयार किये गये है। जिसमें समस्त प्राकृतिक संसाधनों, आवास, रोड नेटवर्क, सांस्कृतिक पहलू, रहन-सहन, मेले एवं त्यौहारों से सम्बन्धित सूचनायें संकलित है। एस.आई.एस.डी.पी. रिपोर्ट के अन्तर्गत सम्पूर्ण राज्य के जिलेवार थिमेटिक मैप 1ः10000 स्केल पर तैयार किये गये है। उत्तराखण्ड जियोस्पाषियल सर्विसेज पोर्टल यू-सैक द्वारा तैयार किये गये इस पोर्टल में भू-स्थानिक डेटा बेस को वेब आधारित सूचना तंत्र से मैप के रूप में उपयोग किया जा सकता है। यह तंत्र वर्तमान में 08 थीम में सूचना प्रदान करेगा। जो कि राज्य के विभिन्न रेखीय विभागों एवं नीति नियोजकों को सूचनायें इन्टरेक्टिव मंच के रूप में प्रदान करेगा।
एस.आई.एस.डी.पी. परियोजना अधिकारी व वैज्ञानिक डॉ. गजेन्द्र सिंह ने बताया कि इस परियोजना के अंतर्गत उत्तराखंड राज्य के लिए जिलेवार 1ः10000 पैमाने पर भू-आवरण भू-उपयोग, जल निकासी एवं रोडध्रेल नेटवर्क मानचित्र तैयार किये गए हैं जो कि 2.5 मीटर रेजूलेषन पर उपलब्ध है। उक्त मानचित्रों एवं डेटा का उपयोग राज्य के विभिन्न रेखीय विभागों के कार्य योजनाओं के सटीक क्रियान्वयन हेतु मील का पत्थर साबित होगा। डाॅ0 रावत ने कहा कि जनपद पिथौरागढ़ के लिए 40 से अधिक भू-स्थानिक मानचित्र भी तैयार किये गए हैं ।
इस अवसर पर पंचायती राज संस्थानों के सशक्तीकरण योजना के बारे में बताते हुये केन्द्र के वैज्ञानिक- शशांक लिंगवाल ने बताया कि इस परियोजना के अन्तर्गत पिथौरागढ़ जनपद के ग्राम पंचायत स्तर के समस्त परिसम्पतीयों का भी मानचित्रण किया जा रहा है जिसमें प्राकृतिक संपदा जल-संसाधन, संस्कृति पहलू, रहन-सहन, खान-पान एवं मेले तथा त्यौहारों आदि की सभी सूचनायें एकत्रित कर मानचित्रण किया जा रहा है। अभी तक जिले में 20000 से अधिक परिसंत्तियों का मानचित्रण किया जा चुका है। ये सूचनाएँ पंचायत स्तरीय योजनाओं के नियोजन, दीर्घ-कालिक मॉनिटरिंग व रखरखाव में महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करेंगे।
इस अवसर पर आई.आई.आर.एस. के निदेषक डाॅ0 प्रकाष चैहान ने बताया कि आई.आई.आर.एस. द्वारा रेखीय विभागों की आवष्यकतानुसार ट्रैनिंग प्रदान करने के लिये आई.आई.आर.एस. प्रतिबद्व है। उन्होंने कहा कि इपरिस परियोजना के तहत पंचायतों के सषक्तिकरण हेतु यू-सैक द्वारा पिथौरागढ जनपद में किया गया कार्य पंचायतों के विकास के लिये महत्वपूर्ण साबित होगा।

कार्यशाला के द्वितीय एवं तकनीकी सत्र में भू-स्थानिक (ळमवैचंजपंस) सूचना साझा करने विषय पर परिचर्चा आयोजित की गयी। इस सत्र की अध्यक्षता महानिदेषक यू-काॅस्ट डाॅ0 राजेन्द्र डोभाल ने की। जिसमें किस प्रकार से आपसी सहयोग एवं नीति नियोजन हेतु भू-स्थानिक सूचनाओं का आदान-प्रदान हो, पर एक परिचर्चा की गयी । डाॅ0 डोभाल ने बताया कि राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुये भू-स्थानिक डाटा का साझाकरण नितांत आवष्यक है व साथ ही बिना आर.एस., जी.आई.एस. प्रणाली के राज्य में नीति नियोजन की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। छत्ैब् हैदराबाद के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. राजीव कुमार ने कहा कि डाटा कही भी बने कोई भी विभाग उसका सृजन करें उसका ट्रासमिषन व वितरण एक संस्थान में हो जो कि इसरो द्वारा प्रदेष में यू-सैक नामित है। उसके द्वारा ही विभिन्न रेखीय विभागों की आवष्यकतानुसार डेटा का आदान-प्रदान हो। परिचर्चा में डॉ. प्रकाश चैहान निदेषक आई.आई.आर.एस., डॉ. चम्पतिरे-वरिष्ठ वैज्ञानिक आई.आई.आर.एस., कार्यशाला में राष्ट्रीय व राजकीय संस्थानों, विभिन्न रेखीय विभागों के 200 प्रतिनिधियों, विज्ञानिकों, शोधार्थियों ने प्रतिभाग किया। कार्यक्रम में वाडिया के निदेषक डाॅ0 कलाचन्द्र सैन, पूर्व निदेषक- डाॅ0 मीरा तिवारी, डाॅ0 डोभाल डॉ. अरुणा रानी, डॉ सुषमा गैरोला, डॉ आशा थपलियाल, श्री पुष्कर कुमार, आर. एस. मेहता, दिनेश चन्द्रा, सुधाकर भट्ट, श्री हेमन्त बिष्ट, दिव्या उनियाल, नवीन चन्द्र, विनीत पाल, आशा भण्डारी, प्रवेश सकलानी, अंजू पंवार, अरविन्द सिंह, देवेश कपरवान, सौरभ डंगवाल आदि मौजूद रहे। कार्यशाला का संचालन केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. प्रियदर्शी उपाध्याय ने किया।