तुंगनाथ दर्शन के बहाने 16 साल बाद खुले घरों के ताले।

भगवान तुंगनाथ की चल बिग्रह डोली दो माह की यात्रा देवरा यात्रा पर ।


चमोली(पोखरी) भगवान तुंगनाथ की चल विग्रह डोली 3 जनवरी से भक्तों को आर्शीवाद देने व कुशल क्षेम लेने चन्द्र सिला पट्टी व खदेड पट्टी के दर्जनों गांवों में देवरा यात्रा पर है। जहां भगवान तुंगनाथ के दर्शनों के लिए देश विदेश के प्रवासी उत्तराखंडी पंहुच रहे है।क्षेत्रीय आराध्य देव व भूमियाल देवता के प्रति लोगों की अटूट आस्था व विश्वास का प्रमाण इस बात से लगाया जा सकता है कि,16 साल बाद लोग अपने घरों में लोग वापस आ रहे है। इससे क्षेत्र के गांवों में चहल-पहल से उत्सव का माहौल बना हुआ है।
देवरा यात्रा मक्कू गांव से होते हुए कुलसीर से चन्द्रशिला पट्टी के नैल,नौली,गुणम से होते हुए मशोली गांव पंहुची। मसोली गांव में भगवान तुंगनाथ की डोली का भव्य स्वागत ग्रामीणों के जरिये किया गया।देवडोली सबसे पहले गांव के देवी मंदिर में पंहुची जहां पूजा अर्चना की गई इसके बाद भगवान तुंगनाथ ने अपनी भूमि का निरीक्षण किया। लोकपरम्परा के अनुसार तुंगनाथ की डोली पधानों की तिवारी में विश्राम करती है। जहां पर मसोली गांव के सभी ग्रामीणों ने भगवान तुंगनाथ की भव्य पूजा अर्चना की उन्हें विभिन्न प्रकार के व्यंजनों व ऋतु फलों का भोग लगाया। इस दौरान भगवान तुंगनाथ ने घर घर जाकर ग्रामीणों की कुसल क्षेम ली व अपना आर्शीवाद दिया।

दो माह की इस देवरा यात्रा में खदेड़ पट्टी के कुल पुरोहितों के गांव किमोठा में भगवान तुंगनाथ का भोग व विधिविधान से पूजा अर्चना की गई।देवरा यात्रा के अगले पडाव में रडवा,चांदनी,खाल,जोरासी,डूंगर,नैल,सेम सांकरी,त्रिसूला,पाब,बिशाल,समेत दर्जनों गांवों में भ्रमण कर वापस मक्कू में विराज मान होगें।
गौरतलब है कि भगवान तुंगनाथ पंच केदारों में एक है।पुराणां के अनुसार भगवान शिव के भुजाओं वाले भाग के तुंगनाथ के नाम से जाना जाता है। यह रूद्रप्रयाग व चमोली के सैकडों गांवों के आराध्य देव के साथ साथ भूमियाल देवता भी माने जाते है।भगवान तुंगनाथ की देवरा यात्रा लगभग हर 15 या 16 साल में निकाली जाती है। जिसमें क्षेत्र के दर्जनों गांव के लोग अपनी भागदारी निभाकर पुण्य अर्जित करते है।

अटूट आस्था व विश्वास का प्रतीक उत्तराखंड में सैकडों देवी व देवताओं का हर साल देवरा यात्रा निकाली जाती है। सदियों से चली आ रही यह पंरम्परा हमें एक ओर भक्ति व आध्यात्म से जोड़ती है। वहीं दूसरी ओर एकता के सूत्र में भी बांधती है।पलायन का दंश झेल रही पर्वतीय जिले के लोग जहां शहरों में अपनी संस्कृति व लोकपरम्पराओं के लिए तरस रहें है।देव डोलियों के समय समय पर देवरा यात्रा में जाने से कई सालों से बंद घरों के ताले सिर्फ इसलिए खुल गये कि अपने आरोध्य देव के दुर्लभ दर्शन हो जाते है।

भानु प्रकाश नेगी,देहरादून