यहां होती है भक्तों की हर मुराद पूरी।

 

//भानु प्रकाश नेगी//

उत्तराखंड देव भूमि के नाम से विश्व विख्यात है। यहां चार धाम के अतिरिक्त कई शक्तिपीठ एवं सिद्वपीठ हैं जहां अदृश्य शक्ति के रूप मंे देवी देवताओं का वास है। इन्हीं सिद्पीठों में टिहरी जिले के थत्युड व्लाक में कददूखाल से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी सुरकुट पर्वत पर स्थित मां सुरकण्डा का मंदिर भी एक है। जहां दूरदराज क्षेत्रों से आये लोगों की हर मुराद माता के मंदिर में पूरी होती है।

मंदिर के मुख्य पुजारी खिलानंद लेखवाड ने बताया कि पुराणों के अनुसार दक्ष प्रजापति के यज्ञ मंे जब मां सती ने आत्मदाह किया था,तक शिवशंकर भोले नाथ ने माता सती का पार्थिव शरीर त्रिशूल में रख कर पूरे उत्तराखंड में धूमाया था,उसी क्रम मंे भगवान विष्णु ने अपने सुर्दशन चक्र से शरीर को काट कर अनेक स्थानों पर डाल दिया गया, जहां-जहां ये अंग गिरे वहां वहां शक्तिपीठ स्थापित हो गये।इस स्थान पर माता सती का सिर गिर गया था। क्योकि यह स्थान सुरकुट पर्वत है इसीलिए मां भगवती की पूजा यहां पर सुरकण्डा देवी के नाम से की जाती है।इस स्थान पर भगवान इन्द्र ने भी तपस्या की थी। यह स्थान आदि अनादिकाल से शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है।
चारों ओर से प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर यह स्थान अतियंत रमणीक है। जहां आकर श्रधालूओं का मन प्रसन्नचित हो जाता है। मंदिर स्थल उॅचाई पर होने के कारण यहां पर सबसे बडी समस्या पानी की है। जिसे अभी खच्चरों के द्वारा पंहुचाया जाता है। साथ ही पूरे रास्ते में कही भी शौचालय और पीने के पानी की व्यवस्था न होने से यहां आने वाले यात्रियों को काफी परेसानियों का सामना करना पढता है। पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील होने के बावजूद भी यहां पर कूडा निस्तारण के लिए राज्य सरकार और मंदिर समिति द्वारा कोई व्यवस्था नही है। जिसके कारण यहां जगह-जगह प्लास्टिक की बोतलें, पाॅलीथीन आदि के ढेर देखे जा सकते है।राज्य सरकार द्वारा यहां पर रोपवे का कार्य निमाणाधीन है, जिससे आने वाले समय में यात्रियों की संख्या में बडोत्तरी होना तय है।

मंदिर के पुजारी के अनुसार नवरात्रि और अन्य शुभ अवसरों पर माता सुरकंण्डा मंदिर में भक्तों की भीड लगी रहती है। यहां आने वाले सभी यात्रियों के लिए मंदिर समिति की ओर से रहने और खाने की उचित व्यवस्था है।