आखिर कब तक बना रहेगा उत्तराखंड हड़ताली प्रदेश?

आखिर कब तक बना रहेगा उत्तराखंड हड़ताली प्रदेश
आंन्दोलन के गर्भ से जन्मा युवा उत्तराखंड अपने जन्मदिन के बाद से ही धरना, प्रर्दशन, अनसन की राह पर है।अपनी जायज मांगों के लिए समय समय पर कर्मचारियों को हड़ताल करना कई मायनों मे सही भी है। लेकिन छोटी छोटी मांगों और अनायास हर प्रकार की समस्या के लिए सरकारी कर्मचारियों को हड़ताल करना किसी भी मायने में सही नही है।


10 सूत्रीय मांगों को लेकर प्रदेश भर के तीन लाख कर्मचारियों की सामूहिक हड़ताल किसी भी मायनें मे सही नही ठहरायी जा सकती है।सही मायने में देखा जाय तो सातवें बेतन आयोग को पूर्व सरकारों ने अपने निजि हित के लिए लागू कर कर्मचारियों को लॉलीपॉप तो थमा दिया था परन्तु उसे सही तरीके से लागू न कर वर्तमान सरकार की राह में उसी समय कांटे बो दिये।आप उसी का परिणाम है कि सरकार को अपने ही कर्मचारियां की नाराजगी झेलनी पढ रही है।


हॉलाकि सरकार ने कर्मचारियों को हडताल पर जाने से पहले संवाद के का रास्ता अखितियार करने की सलाह भी दी लेकिन बातचीत में बात न बनने पर कर्मचारियों ने हडताल का गलत रास्ता चुन लिया जिसे प्रदेश हित में किसी भी सूरत में सही नही कहा ठहराया जा सकता है।
कामकाज की बात की जाय तो हर जगह से सरकारी कर्मचारियों के लापरवाही और सुस्थाई की ही बात सामने आती है।वेतन और भत्तों की बात की जाये तो आज के समय में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी का वेतन भी 30 हजार से उपर है।बाकी श्रेणी के कर्मचारियों के वेतन का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।


 लाख टके का सवाल यह है कि,इतनी सुख सुविधाओं और मोटा वेतन मिलने पर भी यहां के कर्मचारी काम करने के लिए तैयार क्यों नही है?क्यों हर बात पर अपनी जिद पर अड जाते है?प्रदेश हित से ज्यादा निजि हित को क्यों ज्यादा महत्व दिया जाता है?आदि आदि  कई प्रश्न चिन्ह प्रदेश के कर्मचारियों पर उठते है। पिछली प्रदेश सरकारों की गलतियां यह रही है कि,अपने निजि हित के लोकलुभावन घोषणायें कर देते है,जो समय पर पूरी न होने  के कारण भविष्य की सरकारों के लिए आफत बन जाती है।



शासन व प्रसाशन को चाहिए की कर्मचारियों पर पारदर्शिता के साथ नियमावली के अनुरूप नियम कानूनों को लागू किया जाय और हड़ताली कर्मचारियों से सख्ती से निपटें ताकि आने वाले समय में कर्मचारी हड़ताल पर जाने से कई बार सोचें। तभी प्रदेश का  कुछ भला हो सकता है।
-भानु प्रकाश नेगी, देहरादून।