अब ऐसे शिक्षक कहां? विद्यादत्त रतुड़ी पर आधारित वरिष्ठ पत्रकार गुणानंन्द जखमोला की पहली पुस्तक का विमोचन।

अब ऐसे शिक्षक कहां?
– यूकेडी के संरक्षक श्री विद्यादत्त रतूड़ी पर लिखी
मेरी पुस्तक कर्मयोगी विद्यादत्त रतूड़ी का लोकार्पण
– ऋषिकेश में केबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल और श्री मोहन सिंह गांववासी ने किया पुस्तक का लोकार्पण
राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित 88 साल के श्री विद्यादत्त रतूड़ी जी लम्बगांव स्कूल के प्रधानाचार्य रहे। 1950 के दौर में शहरों में अच्छी नौकरी और अवसर थे।

रोजगार की मारामारी नहीं थी। श्री रतूड़ी ने शहरी जिंदगी को छोड़ अपनी थाटी और माटी को अपनाया। तब शिक्षक को चंद रुपये ही वेतन मिलता था, बदले में शिक्षक शिक्षा के साथ अपने शिष्यों को संस्कार भी देता था। श्री रतूड़ी जी ने शिक्षक रहते न सिर्फ शिक्षा और संस्कार दिये बल्कि अपने टिहरी में सामाजिक कुरीतियों जैसे बलि प्रथा रोकने, बाजगी और दस्तूरी प्रथा बंद कराने का काम भी किया। उन दिनों टिहरी में रामलीला नहीं होती थी क्योंकि एक राज्य में दो तिलक नहीं हो सकते थे। ऐसे में श्री रतूड़ी जी ने 1956 में टिहरी में रामलीला की शुरूआत की। वह स्वच्छता और वनों के संरक्षण के प्रतिनिधि रहे। उन्होंने पचास के दशक में ही महिला और युवक मंडलों का गठन किया। 2010 में देवडोलियों के कुम्भ स्नान का श्रेय भी उन्हीं को जाता है।

राजनीति में उनका अनुभव कडुवा रहा लेकिन आज भी वे शिक्षा से नाता जोड़े हुए हैं। उन्होंने समाज में एक आदर्श प्रस्तुत किया कि शिक्षक यदि चाहे तो समाज को एक अच्छी दिशा दे सकता है।

 

उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को मैंने छूने की कोशिश की है, कितना सफल होता हूं, पाठक तय करेंगे। श्री रतूड़ी जी के दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की कामना।