कैसा रहा एक साल त्रिवेन्द्र रावत सरकार का…..

त्रिवेन्द्र सरकार का एक साल पूरा. परेड मैदान मैं भब्य आयोजन

                                                                  //भानु प्रकाश नेगी

18 मार्च 2017 को आज के दिन भाजपा के वरिष्ठ व अनुभवी नेता त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने देहरादून के एतिहासिक परेड मैदान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गरिमामयी उपस्थिति में उत्तराखंड के 9वे मुख्यमंत्री की सपथ ली थी। प्रचंड़ बहुमत और डब्बल इंजन से जुडने के बाद उत्तराखंड के दूर दराज के गांव में बसे अंन्तिम आदमी को राज्य के बुनियादी विकास की उम्मीद डब्बल हो गयी थी। जीरो टलरेन्स पर काम करने वाली सरकार के मुखिया भले ही स्यंम में स्वच्छ छवि के नेक इन्सान हो लेकिन छोटे से बड़े दफ्तरों में टेविल के नीचे के खेल के बिना अभी भी फाईल सरकती नजर नहीं आ रही है।


बुनियादी सुविधाओं की बात की जाय तो हालत मे कुछ ज्यादा फर्क नहीं दिख रहा है।दूरदराज के गांवों में जहां सड़कें, स्वास्थ्य,बिजली, पानी और रोजगार की सुविधायें ना के बराबर है वहां लोग अभी भी 18वी सदी के जैसा जीवन जी रहे है। भले ही सरकार ने कुछ गावों में बिजली के नये कनेक्सन लगवाये है लेकिन वास्विकता अभी भी कोशों दूर है।
पिछली सरकारों द्वारा किये घोटालो और एनएच 72 जैसे बडे घोटाले की सीबीआई जांच अभी तक नहीं हो पायी है। हाल के एक वयान में सरकार यह कह चूकी है की प्रदेश मे लोकायुक्त की जरूरत ही नही है,जो अपने आप मे एक बड़ा प्रश्नचिन्ह सरकार की जीरो टल्रेन्स पर लगाता है कि जिस प्रदेश मैं बारी-बारी से भाजपा और कांग्रेस सरकारों में दर्जनों घोटाले हुये है और लगातार हो रहे हो वहां लोकायुक्त की आवश्यकता क्यों नही है?
भले ही त्रिवेन्द्र रावत सरकार पिछली सरकार से अभी कोरी घोषणायें करने में पीछे रही हो लेकिन एक साल पहले की गई कई घोषणायें के पत्थर वर्तमान सरकार के भी धूल फांक रहे है।
सरकारी आंकड़े और दावे भले ही एक साल में विकास की गंगा बहने की बात कर रहे हो लेकिन हकीकत हाथी के दोतों जैसी है। (खाने के कुछ और दिखाने कुछ)। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने अपने सादगी भरे जीवन की तरह ही सधे कदमों से प्रदेश की विकास की कोशिस कर रहे है लेकिन सरकार के कुछ मंत्रीयों ने पल्स माईनस का पल्स पता कर प्रदेश सरकार की देश और दुनियां में भद पिटवाई है।


राजधानी के मुद्दे पर सरकार अभी भी भटकी हुई नजर आ रही है जनभावनाओं के अनुरूप राजधानी को गैरसैंण के बजाय देहरादून शहर में ही रखने के मूड में दिख रही है बजटसत्र भले ही महत्वपूर्ण हो और वह गैरसैंण में आयोजित किया जा रहा हो लेकिन इसे राजधानी की समस्या का समाधान तो नही हो रहा है।
पहाड़ की पीड़ा को यदि कोई पहाडी मूल का मुख्यमंत्री नही समझ सकता है तो मैदानी मूल के लोगों के लिए पहाड़़ पहाड़ जैसा तो लगेगा ही। यूं तो मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत को ठेट पहाड़ी माना जाता है क्योकि उन्होनें बचपन से लेकर जवानी तक की पढाई लिखाई पहाडी के अपने गांव में ही की है लेकिन सत्ता का दबाव हो या वोट बैंक की राजनीति जो उन्हें पहाड में राजधानी बनाने से रोक रहा है यह कहना काफी मुस्किल।


बहरहाल एक साल के कामकाज को दो घंटे में बताने के लिए परेड मैदान में लाखों रूपये का भब्य पाण्डाल बनाया बनाया गया है। जिसमें राज्य की माली हालत का बखान किया जायेगा। उत्तराखंड जैसे तंग आर्थिक हालत वाले प्रदेश में यह काम राज्य सरकार फिजूल खर्ची से बचकर अपनी बात खुले मैदान में कम खर्चे में भी कह सकती थी । ये तो वही बात हो गई की उधार लेकर घी पी लो तब देख लिया जायेगा।

कुल मिलाकर वर्तमान सरकार का एक साल का कार्यकाल उम्मीदों में ज्यादा खरा नही रहा है। लेकिन जिन महत्वाकांक्षी योजनाओं के सरकार ने अभी तक शिलान्यास किये है वो धरातल पर जल्द उतर जाय और पहाडी जिलों में बुनियादी सुविधाओं पर अधिक जोर दिया जाय तो पांच साल सरकार के बेमिसाल हो सकतें है।