लोक परम्पराओं में क्यों खास है सरांऊ नृत्य।

भानु प्रकाश नेगी।


देहरादूनःखास लोक परंम्पराओं और सांस्कृतिक विरासतों के लिए देश और दुनियां में प्रसिद्व उत्तराखंड में कई लोक कलायें पलायन की वजह से विलुप्ति की कगार पर पंहुच गये है। इन में से एक सुप्रसिद्व नृत्य है सरॉव। कभी पौड़ी गढ़वाल की शान माने जाने वाला यह नृत्य आधुनिक संगीत की चकाचौंध में खो सा गया है। लेकिन कुछ समाजसेवी व संस्कृति प्रेमी ऐसे है, जिन्होंने इसे जिन्दा रखने के लिए तन-मन-धन से संकल्प लिया है।सरॉव नृत्य इन्हीं में से एक है रंणबाजा के तौर पर प्रसिद्व इस नृत्य को युद्व से पहले जोश दिलाने में किया जाता था। इस विलुप्त होते नृत्य की एक झलक देहरादून के एक पंचसितारा होटल में देखने को मिली।जहां लोगों ने इस लोकनृत्य को कौतुहल के तौर पर देखा।


सरॉव नृत्य के संरक्षण में समर्पित उत्तराखंड अंतरिक्ष केन्द्र निदेशक प्रो. एम.पी.एस. बिष्ट का कहना है कि, यह हमारी लोक परंम्परा व संस्कृति का नायाब नमुना है। जिसे संरक्षित करना आवश्यक है।सरांॅव नृत्य की शादी व मेले आदि अवसरों पर बहुत अहमियत थी।पौड़ी के सुप्रसिद्व नैनीडांडा मेले से पहले यह कार्यक्रम एक माह तक बच्चों को सिखाया जाता था। जिसका वहां पर भब्य तरीके से मंचन होता था।नैनीडांडा में गांव के बच्चे,बूडे,और जवान गाजे बाजे के साथ सरांव नृत्य करते हुऐ नौनीडांडा मेले में जाया करते थे।

अब यह विधा विलुप्ती की कगार पर पंहुच गई है। मेरा प्रयास है कि इस कला को दुबारा से संजोया जाय ताकि आने वाली पीड़ी भी अपनी लोककला व विरासतों के बारे में जान सकें और इस लोक कला से जुडें लोंगों को रोजगार मिल सके।


क्या है सराॅऊ नृत्य

यह हमारी एक पौराणिक विधा है। जो कि गढ़ नरेशों के बीर भडों के माध्यम से आम जन तक प्रचलन मेँ आई । पहले राजा जब किसी दुर्ग पर फ़तह के लिये जाते थे तो अपने रण बांकुरों के साथ ढाल-तलवार, ढोल -नंगाडे व दमांउ के साथ रणशिंगा की धुन और बड़े ही हुंकार के साथ रणभूमि को फ़तह कर आते थे । युद्ध में जाते समय सेना के आगे और पीछे दो ऊँचे व बड़े बड़े लाल और सफ़ेद झंडे (निशाण ) जिन पर विभिन्न टैबू (गोत्र चिन्ह ) बने रहते थे । यही प्रथा कालान्तर में शादी-ब्याह, मेला-खौला (कौथिग) व अन्य मंगल कार्यों मे भी चलने लगी और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती गयी । मुझे याद है अपना बचपन जब गाँव में चैत्र मास में दिनभर काम समाप्त के बाद गाँव के सभी बच्चे बूढ़े और जवान, महिला-पुरुष हमारे चौक (थाड मा) रात भर बारी बारी से सराँव नृत्यों साथ साथ, थड्या, चौंफला, झुमैला गाते थे । और अन्त मे वैशाखी मेले , (२ गते वैशाख भौन का मेला, इडियाकोट तल्ला, पौडी गढ़वाल) से ठीक एक रात पहले तक मेरी ड्यूटी होती थी मिठाई के रूप में गुड बाँटने की। रामनगर की सुन्दर ४-६ भेली लगती थी हमारे घर से।क्या समय था ! मन आज भी आनन्दित हो जाता है उन दिनों को याद कर । अब धीरे धीरे सब विधायें समाप्ति की ओर है । नयी पीड़ी कहीं खो सी गई इस नयी चकाचौंध में । आवश्यकता है उन्हें समझाने की और उस धरोहर को संरक्षित करने की ।
राजधानी में आते ही प्रयासरत हूँ , सम्पर्क कर रहा हूँ कोई तो आगे आये और इसे बचाये ।इसमें रोज़गार भी है और मनोरंजन भी । सरकार से भी आग्रह है । इस उम्मीद के साथ कोई तो रास्ता निकले ।- डा० महेन्द्र प्रताप सिंह ।