आने वाली परेशानियों के लिए तैयार है आप?

प्राकृतिक आपदा के लिए कितने सजग है हम?
भानु प्रकाश नेगी
पिछले साल उत्तराखंड में भारी बारिस के कारण कई जिला में काफी नुकसान देखने को मिला था। प्राकृतिक आपदा की सबसे ज्यादा घटनायें पिथौरागढ़ जनपद में देखने को मिली।इन धटनाओं ने आने वाले समय के लिए लोगों को आगाह भी किया। बावजूद इसके लोगों की आदतों में सुधार देखने को नहीं मिल रहा है।प्रकृति के साथ हो रही लगातार छेड-़छाड का नतीजा है कि समय आने पर प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाती है,जिसका खामयाजा निरंतर मनुष्य को उठाना पड़ रहा है। प्राकृतिक आपदा को रोक पाना नामुकिंन है लेकिन ठोस प्रबंधन से इसे बचा जा सकता है। हालांकि राज्य सरकार द्वारा आपदा प्रबधंन के लिए स्पेसल एसडीआरएफ का गठन किया गया है। लेकिन विकट भूगोल के कारण आपदा के समय में पीड़ितों को इसका त्वरित लाभ नहीं मिल पाता है।

क्या है आपदा के मुख्य कारण?
उत्तराखंड और आपदा का सदियों से चोली दामन का साथ रहा है। लेकिन पिछले कुछ समय से यहां पर आपदाओं ने जैसे पांव ही पसार दिये है। बरसात का मौसम शुरू होते ही यहां पहाडियों का दरकना,सड़कों का टूटना,जमीनों का भू धांसव आम तौर पर देखा जाता है। आपदा के मुख्य कारणों में प्रकृति का अनावश्यक दोहन,पेड़ों की अनाधुन कटान,नदियों और नालों में बिना मानकों के भवन निमार्ण,उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मनुष्यां की अनावश्यक आवाजाही,ग्लोबल वार्मिग के कारण गिलेश्यिरों का पिधलना,प्लास्टिक का उपयुक्त प्रवंधन न होना,मौसम विभाग का सटीक जानकारी न देना,सरकारी तंत्र का बरसात से पहला सजग न होना,अबैध निमाणों और नदी नाले के किनारे बने भवनां पर कठोर कार्यवाही न होना,पेड़ों की कमी के कारण कार्वन उर्त्सन अधिक होना। अचानक बादल फटना आदि प्रमुख है।

स्थानीय जानकारी रखने वाले लोगों का सहयोग न लेना
प्रकृति प्रदत्त आपदा को रोकना मुनष्य के वस में नहीं है,लेकिन इसे कम किया जा सकता है,या इसे बचा जा सकता है। इसके लिए अभी तक सरकार व स्थानीय जानकारी रखने वाले लोंगों के बीच कम्युनिकेशन गेप देखने को मिला है,जिसके कारण अनायास ही लोग काल के ग्रास में समा जाते है। सरकारों को चाहिए की स्थानीय लोगों से वहीं की सटीक जानकारी लेकर आने वाली आपदा के लिए पूर्ण तैयारियां की जाय साथ ही भविष्य में आने वाली आपदा के लिए उचित प्रबंधन किया जाय।

केदारनाथ की आपदा से नहीं लिया सबक
साल 2013-14 में आई भीष्ण आपदा के बावजूद भी शासन और प्रसाशन ने सबक नहीं लिया,राज्य में एसडीआरएफ के गठन के अलावा आपदा प्रबंधन के लिए सरकार ज्यादा सक्रिय नहीं दिखाई देती हैं। आपदा का दंश सबसे ज्यादा सूबे के पर्वतीय जिलों को झेलना पड़ता है। विकट भौगोंलिक परिस्थिति होने के कारण यहां पर आये दिन आपदा आती है। सरकारी तंन्त्र के उचित प्रबंधन न होने के कारण आपदा ग्रस्त लोगों को जल्द राहत और उपचार नहीं मिल पाता है। जिसके अवज में उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ती है।

पिछले साल राज्य में आपदा की स्थिति
पिछले साल अल्मोंडा जिले में कुल 188 घटनाये हुई थी जिसमें भू स्खलन की10 और सड़क दुर्धटना की 30 घटनायें हुई थी।बागेश्वर में अतिवृष्टि बाढ़ की 474 धटनायें,चमोली में 540 बाढ अतिवृष्टि की घटनायें,भूस्खलन की 242 धटनायें,चम्पावत में अतिवृष्टि की 169 धटनायें,देहरादून में 185 घटनायें।हरिद्वार में 33,नैनीताल में 97,पौड़ी में 14,पिथौरागढ़ में 827,रूद्रप्रयाग में111,टिहरी में 178,उद्यमसिंह नगर में 131,उत्तरकाशी में 780घटनायें सामनें आई है। उपरोक्त घटनाओं से एक बात साफ हो जाती है कि प्राकृतिक छेड छाड़ के कारण प्रकृति साल दर साल अपना रौद्र रूप् दिखाती जा रही है। अभी भी अगर नहीं संभले तो भविष्स कर दृष्य कितना भयावाह होगा इस बात आसानी से समझा जा सकता है।