समौण” उत्तराखंडी स्पेशल उपहार

 

देवभूमि के नाम से देश-विदेश में विख्यात उत्तराखंड प्रदेश अपने सांस्कृतिक विरासतों व नैसर्गिक अपार प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए अलग पहिचान रखता है। देवभूमि में पधारने वाले सैलानी न सिर्फ यहां तीर्थाटन के लिए आते है बल्कि प्रकृति द्वारा लुटाये गये आपार सौन्दर्य का भी जमकर मजा लेते है। जब वह वापस अपने देश व प्रदेश को लौटते है तो यहां की खास चीजों को यादगार के तौर पर ले जाना चाहता है। लेकिन इनकी उपलब्धता तीर्थस्थलों व पर्यटन स्थलों मे न के बराबर होने से सैलानी मायूस होकर लौट जाता था।

इन सब चीजों की पीड़ा को समझ अमेरिका में रह रहे अपनी माटी व थाती से वेहद लगाव रखने वाले (उत्तराखंडी) ईजीनियर दुर्गापाल सिंह ने । इन्होंने स्वदेश लौटकर ईजीनियर का पेसा छोड़ उत्तराखंडी सांस्कृतिक विरासतों को संग्रहित कर सैलानियो को उपहार के तौर पर भेंट करने का बीड़ा उठाया है।जिसके लिए उन्हें सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओ द्वारा कई बार सम्मानित किया जा चुका है।
इस नेक काम में उनकी पत्नी जो पेशे से ईजीनियर है वो भी बखूबी साथ दे रही है। “समौण” गढ़वाली लोकभाषा का शब्द है।जिसका अर्थ यादगार उपहार होता है। समौण के नाम से ईजीनियर दुर्गपाल चौहान ने देहरादून के राजपुर रोड़ जाखन में उत्तराखंडी हस्तकला,हस्तशिल्प , विलुप्त होती सांस्कृतिक विरासतें,उत्तराखंडी विशुद्ध जैविक उत्पाद,भेष भूषा आदि का संग्राहालय है।जो online दुनिया के कोने- कोने में पंहुचाया जा रहा है।
ईजीनियर दुर्गपाल का कहना है कि हमारा उद्देश्य उत्तराखंडी सांस्कृतिक विरसतों का प्रचार प्रसार कर युवाओं को स्वरोजगार की दिशा मे मोड़ना है।मेरा प्रयास है कि उत्तराखंड आने वाले हर तीर्थ यात्री और पर्यटक यहां की समौण लेकर जाय।जिसके लिये यात्रा मार्गो पर समौण की शाखा खोले जाने का विचार किया जा रहा है।
पहाड़ की माटी में रचे बसे ईजीनियर चौहान उत्तराखंड के युवाओं को स्वरोजगार की ओर मोड़ने की मुहिम मे लगे हुये है।उनका कहना है कि यहां स्वरोजगार की अपार संम्भावनानाये है।जिससे उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों से पलायन रोका जा सकता है।क्योंकि यहाँ के 9 पहाड़ी जिले है जिनमें हर एक जिले की हस्तशिल्प कला समेत जैविक उत्पादो की अपनी अलग पहचान है।जिसमें सैकड़ों बेरोजगारों को रोजगार दिया जा सकता है।

भानु प्रकाश नेगी