हिमाचल की तर्ज पर उत्तराखंड में भी बनेगा भूमि कानून??

उत्तराखंड में जमीन खरीदनें और बेचने का हक सिर्फ और सिर्फ मूल उत्तराखंडियों को ही मिलना चाहिए।

9 नवम्बर 2000 से पहले से पहले उत्तराखंड में बसे लोग ही मूल उत्तराखंडी माने जाने चाहिए। राज्य सरकार अन्य पहाड़ी राज्यों हिमाचल प्रदेश, असम आदि की तर्ज पर भूमि कानून बनाये जाने आवश्यकता है।
राज्य स्थापना के बाद जिस तरह से भू-माफियों द्वारा गलत तरीके से नाले-खाले,सरकारी व पट्टे,वन भूमि की जमीन को खुर्द-पुर्द कर बाहरी लोगों को बेचा गया।जिससे मैदानी व कई पहाडी क्षेत्रों में उत्तराखंड से बाहर के लोगों ने पैर जमाने शुरू कर दिये है।जिनकी आड़ मै कुछ आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों ने शरण लेकर देवभूमि उत्तराखंड के शांत वातावरण में जहर घोलने का काम किया है,जो बदस्तूर जारी है।


ये लोग समय-समय पर अपनी आपराधिक गतिविधियों से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहते है।जब से राज्य का निर्माण हुआ है तब से दून समेत कई जिलों में अपराध का ग्राफ लगातार बढता जा रहा है,जो यहां के लोगों में भय के माहौल को जन्म दे रहा है।
मूलभूत जन समस्याओं के आभाव में पहाड़ी जिलों से हो रहे पलायन से यहां के मूल जनमानस की रग्गें दुखी हुई है।लगातार जन शुन्य होते गांवों पर बाहरी राज्यों के लोगों की गिद्द वाली नजर गड़ी है। जिसे ये औने-पौने दाम में खरीद लेगें और आने वाले समय में देवभूमि की सांस्कृतिक व सामरिक विरासतों को खतरा पैदा हो जायेगा।

गांवों में दर्जनों वीघा जमीन के मालिक देहरादून व अन्य मैदानी क्षेत्रों में 2विश्वा जमींन के लिये भी तरस रहे है । परेसानी इस बात की है कि वर्तमान समय जैसे- तैसे कट भी जायेगा लेकिन भविष्य की पीड़ी का न वर्तमान रहेगा और न भविष्य ।तब हमारी भावी पीड़ी अपने पैत्रिक संम्पत्ति में किराये देकर रहेगी ?यह एक गम्भीर चिंन्ता का विषय है जिस पर चिन्तंन करने की अत्यंत आवश्यकता है।
वर्तमान समय में सरकार को इस विषय पर विधान सभा में एक प्रस्ताव पास कर भूमि कानून बनाने की आवश्यकता है। ताकि आने वाली पीड़ी का भविष्य सुरक्षित किया जा सकें…….. क्रमशः

सर्वाधिकार सुरक्षित।
-भानु प्रकाश नेगी,देहरादून।