दिल्ली में रहकर भी पहाड़ के काम आए डाॅ. चातक(जयंती पर खास लेख)

दिल्ली में रहकर भी पहाड़ के काम आए डाॅ. चातक
———————————
(जयंती पर विशेष)
आज हिन्दी और गढ़वाली के विद्वान डाॅ. गोविंद चातक की जयंती है। इन दोनों भाषाओं के प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण के लिए उनका किया गया कार्य अद्वितीय है।
डाॅ. चातक एक लेखक से अधिक एक चिंतक, युगद्रष्टा और समाजसुधारक थे। वे समाज में समानता के प्रबल पक्षधर थे, जातिवाद के धुर विरोधी और लोकसंस्कृति के सच्चे नायक थे। किसी रचनाकार को गढ़वाल की संस्कृति के आकर्षक स्वरूप को विश्वपटल पर आकर्षक रूप में प्रस्तुत करने का सबसे अधिक श्रेय किसी को जाता है तो वे डाॅ. चातक ही थे।
19 दिसंबर, 1933 को सरकासैंणी, लोस्तु (बडियारगढ़), टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड में जन्मे गोविंद सिंह कंडारी की चैथी कक्षा तक की पढ़ाई अपने ही यहां हुई। इसके बाद की पढ़ाई उन्होंने मसूरी, देहरादून और इलाहाबाद से की।
उनका मूल नाम गोविंद सिंह कंडारी था, लेकिन पढ़ाई के लिए वे गांव से बाहर गए और उनके नाम से ’सिंह तथा ’कंडारी’ हटा दिया गया। इसके बाद वे गोविंद चातक बन गए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पीएच.डी करने के बाद वे डाॅ. गोविंद चातक बन गए। लोकसंस्कृति के अनन्य भक्त गोविंद ने अपनी पीएच.डी का विषय गढ़वाली लोकगीतों को ही चुना।
मैंने पत्रकारिता के दौरान दो बार उनका साक्षात्कार लिया। उन्होंने मुझे बताया था कि उन्हें जब पीच.डी की डिग्री मिली तो उनके क्षेत्र में लोगों के बीच सुखद आश्चर्य हुआ। इनमें अधिकांश लोग उस समय डी.फिल की डाॅक्टरेट को डाॅक्टर की ही डिग्री समझते थे। लोगों को बहुत खुशी हुई कि उनके क्षेत्र का एक लड़का डाॅक्टर बन गया है। बाद में डाॅ. चातक ने बारीकी से उन लोगों को पीएच.डी और चिकित्सक की डिग्री का भेद समझाया। उन्होंने गढ़वाली लोकगीत़ विविधा, गढ़वाली लोकगीतः एक सांस्कृतिक अध्ययन, गढ़वाली लोकगाथाएं, उत्तराखंड की लोककथाएं, गढ़वाली भाषा, भारतीय लोकसंस्कृति का संदर्भः मध्य हिमालय, नेपाल की लोककथाएं, गढ़वालः भाषा, साहित्य और संस्कृति जैसी पुस्तकों की अभिसृष्टि कर यहां की संस्कृति के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
हिंदी साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने अविस्मरणीय कार्य किया। हिंदी के शब्द संसार और भाषा पर किया गया उनका अन्वेषणात्मक कार्य आज अनेक अनुसंधित्सुओं की प्यास बुझा रहा है। उन्होंने आधुनिक हिंदी शब्दकोश, बृहद् हिंदी पर्यायवाची शब्दकोश, पर्यायवाची और विलोम शब्दकोश जैसी डिक्शनरियों की अभिसृष्टि की। नाटकों पर किया गया उनका कार्य बहुत ही प्रशंसनीय है। उन्होंने भारतेंदु के संपूर्ण नाटक, नाट्य भाषा,नाटक की साहित्यिक रचना, हिंदी नाटक इतिहास के सोपान जैसी अनेक पुस्तकें लिखीं, जो आज हिंदी साहित्य के नाटक जगत में बड़ा स्थान रखती हैं।
उनके नाटकों की विशेष पहचान यह है कि उन्होंने उसमें लोक, भारतीय और पाश्चात्य शैली की त्रिवेणी प्रवाहित है। लोक के तत्त्व की जीवंतता उनके नाटकों की बहुत बड़ी विशेषता है। ’बांसुरी बजती रही’ उनके ऐसे नाटक का सुंदर उदाहरण है। इसमें गढ़वाल के परिवेश, परंपराओं और पृष्ठभूमि का सुंदर चित्रांकन है। यह नाटक पहाड़ के एक युवक और युवती के मध्य ऐसी प्रेम कथा को बांचता है, जिसमें एक दर्द का ज्वालामुखी और विवशता की बंदिशें हैं। बीजू और छेणी इसके नायक-नायिकाएं हैं, जो बहुत ही सरल और सारगर्भित शब्दों में पूरे पहाड़ की भावनाएं उड़ेल देते हैं। 80 के अंतिम दशक में दर्शकों के समक्ष आया यह नाटक आरंभिक दौर में ही लोकप्रियता के ऊंचे शिखर पर पहुंच गया था।
केकड़े नामक नाटक में उन्होंने समाज के लिए बड़ा प्रेरक संदेश दिया तो ’दूर का आकाश में परंपरा और आधुनिकता का मणिकांचन संयोग है। काला मुंह नामक उनका नाटक अनुसूचित जाति के लोगों के जीवन और विवशताओं को उघाड़ता है। गढ़वाली लोकगाथाओं के संकलन के दौरान वे अनेक ढोलवादकों और बाद्दियों के घरों में साक्षात्कार लेने गए।
मुझसे 2006 में एक साक्षात्कार में उन्होंने इस कष्टसाध्य कार्य के रोचक संस्मरण साझा किए थे।
उत्तराखंड के जनजीवन के हर पक्ष पर लेखनी चलाकर उससे समस्त विश्व को रू-ब-रू कराने वाले डाॅ. चातक न केवल अंतर्राष्ट्रीय स्तर के ख्यातिलब्ध साहित्य पुरोधा थे, बल्कि ऐसे संवेदनशील, संघर्षशील और असाधारण लेखक थे, जिनके रक्त की हर बूंद में गढ़वाली लोकसाहित्य और हिंदी साहित्य के संरक्षण और प्रचार-प्रसार का जज्बा था। उनके लेखन के माध्यम से अनेक लोगों को गढ़वाल को समझने का मार्ग मिला।
उन्होंने गढ़वाली गढ़वाली लोकसाहित्य की विधा-लोकगीत, लोककथा, लोकगाथा, नाटक, भाषा इत्यादि पर इतना कार्य किया, जितना दस लोग मिलकर एक साथ भी नहीं कर सकते। उन्होंने अपने जीवन का महत्त्वपूर्ण समय निकालकर हिंदी साहित्य समेत उपरोक्त विषयों पर पचास के लगभग पुस्तकें लिखी हैं।
जीवन के अंतिम दिनों तक उनकी लेखन यात्रा अनवरत चलती रही। वे कहा करते थे-लेखक, डाॅक्टर और दर्जी मरते-मरते कर्म किया करते हैं। देहावसान के कुछ ही दिन पूर्व तक वे साहित्य साधना करते रहे। 07 जून, 2007 को केदारखंड का यह दैदीप्यमान नक्षत्र इस धरा से अस्त हो गया, लेकिन हिंदी और गढ़वाली लोकसाहित्य के जगत में आज भी प्रकाशमान है। डाॅ. चातक प्रसाद और भारतेंदु के समकक्ष के साहित्यकार थे। साहित्य सृजन में उनकी विशिष्टता को देखते हुए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, साहित्य कला परिषद हिंदी अकादमी दिल्ली से उन्हे अलंकृत किया। उन्होंने साहित्य के साथ ही पत्रकारिता के क्षेत्र में भी ख्याति अर्जित की। कई वर्षों तक उन्होंने एक पत्रिका का भी संपादन किया।
डाॅ. गोविंद चातक एक जगह बैठे रहने वाले साहित्यकार नहीं थे। वे उन साहित्यकारों में नहीं थे, जो पहाड़ के नाम पर खाते हैं, लेकिन पहाड़ लौटकर नहीं आते हैं। वे उन कथित विद्वानों में भी शामिल नहीं रहे, जो गढ़वाली और हिंदी की रोटी खाते हैं और उन्हीं से घृणा भी करते हैं। डाॅ. चातक जितना प्रेम पहाड़ से करते थे, उतना ही प्रेम पहाड़ी यानी गढ़वाली और हिंदी से भी करते थे। शहर में रहकर भी उनकी जवानी गढ़वाल के काम आती रही। जीवन के अंतिम समय तक वे अपने गांव आते रहे और अंतिम दिनों में श्रीकोट, श्रीनगर में भी एक आवास बनाया। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे, लेकिन वे साहित्य रचना के निमित्त पूरे गढ़वाल का भ्रमण करते रहे। गढ़वाली लोकगीतों, लोकगाथाओं और लोककथाओं का संग्रह करने के लिए वे पहाड़ की खाक छानते रहे। अंतिम समय तक वे समय-समय पर गांव बराबर आते-जाते रहे, इसीलिए उनके गांव के लोग और रिश्तेदार उन्हें जानते थे। उनके बाद की पीढ़ी उनसे प्रेरणा लेती थी। उन्होंने पहाड़ के बारे में हमेशा सकारात्मक भाव से लिखा। वे जातिवाद के घोर विरोधी थे, लेेकिन अपनी जन्मभूमि और पहाड़ के प्रति उनके हृदय में असीम प्रेम था।
वे दिल्ली जाकर दिल्ली के नहीं हुए, बल्कि अपनी माटी का प्रेम उन्हें बार-बार पहाड़ आने को विवश करता था। एक बार मैंने उन्हें पूछा कि घात-हंकार, देवी-देवताओं पर आप कितना विश्वास करते हैं? उनका उत्तर था-कोई न कोई शक्ति तो अवश्य है। मुझे अगले महीने नरसिंग पूजने गांव जाना है। 07 जून, 2007 को केदारखंड का यह दैदीप्यमान नक्षत्र इस धरा से अस्त हो गया, लेकिन हिंदी और गढ़वाली लोकसाहित्य के जगत में आज भी प्रकाशमान है। आखर समिति श्रीनगर, गढ़वाल डाॅ. चातक की जयंती पर आखर साहित्य सम्मान प्रदान करती है। इस बार यह सम्मान ख्यातिलब्ध साहित्यकार ललित केशवान को दिया जा रहा है। श्री केशवान सर्वथा इसके योग्य हैं। इस सम्मान समारोह का आयोजन करते आ रहे संदीप रावत (अध्यक्ष आखर समिति) जी साधुवाद के पात्र हैं।

-डॉ.वीरेन्द्र बर्त्वाल, देहरादून