रूद्रप्रयाग की इस बेटी के जज्बे को सलाम।

-कुलदीप राणा “आज़ाद” /रुद्रप्रयाग

आइए आपको रूद्रप्रयाग में एक ऐसी बेटी से मिलाते हैं जो संघर्षों की भट्टी में तपकर चमकर बिखेर रही है, अपने अल्प संसाधनों से कृषि और स्वरोजगार कर हर किसी के लिए नजीर बनी हुई हैं

आग की भट्टी में तपकर ही सोना चमक बिखेरता है। अमूमन यह कहावत अभी तक पुरूष प्रदान समाज पर ही अधिक लागू होती थी लेकिन रूद्रप्रयाग की एक बेटी पर यह कहावत सटीक बैठती है। हालांकि आज बेटियां न सिर्फ पुरूर्षों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही बल्कि वे खुद के बल बूते अपनी एक अलग पहचान भी बना रही हैं। आज हम जिस बेटी का जिक्र कर रहे हैं उसने न केवल विपरीत पारिस्थतियों में परिवार को आर्थिक तंगी से उभारने का कार्य किया है बल्कि स्वरोजगार की दिशा में भी वह ऐसा कार्य कर रही है जिससे वह सब के लिए नजीर बनी हुई हैं। खेतों में हल लगाती हुई जिस युवती को आप नीचे वीडियो में देख रहे हैं यह कोई शौकिया तस्वीर नहीं हैं, बल्कि यह रूद्रप्रयाग जनपद मुख्यालय से पांच किमी की दूरी पर स्थिति सौड़ उमरेला गाँव की 22 वर्षीय बबीता रावत की है जो पिछले दस वर्षों से इसी तरह खेतों में स्वयं हल लगाती हंै। दरअसल वर्ष 2009 में बबीता के पिता सुरेद्र सिंह रावत की अचानक हार्ट में दिक्कत होने के कारण तबियत खराब हुई तो परिवार की आर्थिक स्थिति डगमगाने लगी। सात भाई बहिनों समेत नौ सदस्यों के परिवार में अकेले बबीता के पिता दिल्ली में छोटी-मोटी प्राइवेट नौकरी करके परिवार का भरण पोषण कर रहे थे लेकिन उनके बीमार होने से परिवार पर रोजी रोटी का संकट पैदा हो गया। ऐसे में अब मात्र खेती का ही सहारा था लेकिन यहां भी हल लगाने की समस्या सामने खड़ी थी। ऐसे में 14 साल की बबीता ने उस वक्त खुद ही खेतों में हल लगाना शुरू कर दिया।


खेती से किसी तरह परिवार का भरण पोषण तो हो रहा था लेकिन बबीता से बड़ी तीन बहिनों की शादी भी अब चुनौति बनी हुई थी। बबीता की माँ राधा देवी गाय-भैंस पालकर दूध बेचती थी। बबीता हर रोज सुबह खेतों में हल लगाने के बाद पांच किमी दूर पैदल इण्टर काॅलेज रूद्रप्रयाग में पढ़ाई करने के लिए आती थी और साथ में दूध बेचने के लिए भी लाती थी। कहने को भले ही काम खेती बाड़ी और पशुपालन तक सिमटा रहा हो लेकिन इस कार्य ने न केवल बबीता की तीन बहिनों की शादियां सम्पन्न करवाई बल्कि पिता की दवाई और खुद बबीता ने इस खर्चे से एम0ए0 तक की पढ़ाई भी सम्पन्न की। जबकि बबीता की एक छोटी बहन और एक भाई भी इसी से पढ़ाई कर रहे हैं। पिछले दो साल से बबीता अपने ही अल्प संसाधनों में परिवार का भरण-पोषण के लिए मशरूम उत्पादन का कार्य भी कर रही हंै।
विषम पारिस्थितियों में खेती बाड़ी और स्वरोजगार कर रही बबीता सरकार की नीतियों से भी आहत है। बबीता कहती है सरकारें एक तरफ जहां बेटी बचाओं-बेटी पढ़ाओं जैसे नारे उछालती है वहीं जब कोई बेटी आगे आती है तो उसे सरकार की किसी भी योजना का लाभ नहीं मिल पाता है। बबीता खुद खेती-बाड़ी के विभिन्न उपकरणों के लिए कृषि और उद्यान विभाग के कई चक्कर लगा चुकी हैं लेकिन उसे आज तक सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाया है।
दृढ़ इच्छा शक्ति और बुलंद हौसलों से ओतप्रोत न जाने कितनी ही बबीता पहाड़ों की कन्द्राओं में मौजूद हैं लेकिन इन बेटियों के प्रोत्साहन और इन्हें आगे बढ़ाने के लिए सरकार की तमाम योजनाएं और नीतियां क्यों कागजों से निकल कर बबीता जैसी जरूरतमंद बेटियां की चैखट तक नहीं पहुँच पाती है यह समझ से परे हैं। बहरहाल बबीता के बुलंद हौंसले सरकारों के साथ ही उन लोगों को भी आइना दिखा रहे हैं जो बेटियों को बोझ मात्र समझते हैं।