विभागीय इंजीनियरों का हैरतअंगेज खेल, गांव की जगह जंगल ले गए सड़क!

कुलदीप राणा ‘आजाद, रूद्रप्रयाग


देश की आजादी के 70 साल गुजर चुके हैं और अपना राज्य उत्तराखण्ड बने 18 वर्ष बीत गए हैं। लेकिन रूद्रप्रयाग और चमोली जिले की सीमा पर स्थिति भगवान कार्तिक स्वामी के आधार शिविर कनकचैरी घाटी के गोदीगिंवाला, सेरा मयकोटी, दबियाणा, भूण, खणसू जैसे दर्जनों गांव आज भी समझ नहीं पा रहे हैं कि वे आजादी का उत्सव मनाये या अपने राज्य गठन का जश्न। सड़क जैसी मूलभूत सुविधा और मौलिक अधिकार ग्रामीणों को आज भी नसीब नहीं हुआ तो समझा जा सकता है कि इन ग्रामीणों को कैसी आजादी मिली और कैसा अपना राज्य।

स्थिति ये है कि जिस पहाड़ी प्रदेश की स्थापना को लेकर उन्होंने हसीन सपने संजोये थे, इन्होंने सोचा भी नहीं था कि अपने ही राज्य में अपनों के ही द्वारा उन्हें उपेक्षित और ठगा जायेगा। हालांकि वर्ष 1998 में कनकचैंरी-पोखठा-रोता मोटरमार्ग के प्रथम ढाई किलो मीटर की स्वीकृति मिलने के बाद ग्रामीणों में एक आस जगी थी कि शायद उनके गांव भी सड़क मार्ग से जुड़ पायेंगे लेकिन इन सभी गांवों को जोड़ने के लिए 13 किमी सड़क की स्वीकृति देने के लिए सरकार ने 20 वर्षों का लम्बा समय तो लगा दिया है मगर इतने लम्बे इंतजार के बाद यह सड़क आबादी वाले गांवों को छोड़कर जंगलों को जोड़ रही है। जी हाँ ठीक सुना आपने। जिन गाँवों के लिए यह सड़क बनाई जा रही थी लोक निर्माण विभाग की घटिया कार्य प्रणाली के चलते यह सड़क दर्जनों गांवों को छोड़कर जंगल में काटी जा रही है जिससे ग्रामीणों को लाभ तो नहीं मिल पा रहा है लेकिन उसके निचले इलाकों के गावों में भूस्खलन का संकट जरूर पैदा हो गया है।

दरअसल गोदीगिवाला क्षेत्र के दर्जनों गाँव अब तक सड़क नहीं पहुँच पाई है। सड़क के अभाव में आज भी ग्रामीणों को रोजमर्रा की आश्यक सामग्री लाने के लिए दस से 15 किमी दूरी पैदल तय करने पड़ती है। बुखार की गोली के लिए या तो 40 किमी दूर रूद्रप्रयाग आना पड़ता है या फिर 35 किमी दूर पोखरी।  देश दुनियां से अलग-थलग पड़े इन गांवों के ग्रामीणों सड़क न होने से नरकीय जिंदगी जीने को मजबूर हैं। बीमार, बुजुर्ग गर्भवती महिलाओं और स्कूली बच्चों को सबसे ज्यादा दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। बीमारों को डंडियों के सहारे ले-जाते हुए  कई बीमारों ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया है। जबकि स्कूली बच्चे भी जान जोखिम में डालकर हर रोज 10 किमी पैदल दूर तय करते हैं। लेकिन इन गावों की सुधलेवा न तो क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि हैं न सरकार और न ही उसका तंत्र।

वर्ष 1998 में कनकचैरी-पोखठा-रौता के लिए पहला ढाई किमी मोटर मार्ग की स्वीकृत हुई थी, जिसे पीएमजीएसवाई द्वारा 10 से अधिक सालों में भी पूरा नहीं किया गया। जबकि अक्टूबर 2005 में आगे के करीब 5 किमी की स्वीकृति मिली जिसका निर्माण कार्य एडीबी द्वारा किया गया। एडीबी द्वारा भी इस मोटर मार्ग के एलाईमेंट में भारी अनिमिताएं बरती गई और इस मोटर मार्ग को ऐसा घुमा दिया मानों कभी पाताल लोक की सैर कर रहे हो तो कभी आकाश की। अब छूटे हुए करीब एक दर्जन गावों को जोड़ने के लिए 6 किमी सड़क की स्वीकृति नवम्बर 2009 में मिली जिसका निर्माण कार्य लोक निर्माण विभाग पोखरी द्वारा किया गया। लेकिन लोनिवि द्वारा उन सभी गांवों को इस सड़क से वंचित रखा गया जिनके लिए यह सड़क बनाई जा रही थी, विभागीय इंजीनियरों का हैरतअंगेज खेल तो देखिए जंगलों में इस सड़क को ले जाया जा रहा है जहां यह सड़क केवल और केवल विनाश ही कर रही है। जहां भारी मात्रा में बाँज के हरे पेड़ काटे जा रहे हैं वहीं इसके नीचे दर्जनों गांव भी सड़क के मलबे से भूस्खलन की जद में आ सकते हैं। पिछले बीस वर्षों से सड़क की आस लगाये दर्जन भर ग्रामीणों की इस सड़क से अब भी तीन से चार किमी की दूरी है। लेकिन जिलाधिकारी चमोली समेत लोनिवि पोखरी को इन गांवों को सड़क से जोड़ने कई बार मांग करने के बाद भी ग्रामीणों की सुनवाई नहीं हो रही है।  21वीं सदी में भी आदिमानवों की तरह जिन्दगी जी रहे ये ग्रामीण विकास की मुख्य धारा में आज तक भी नहीं आ पाये हैं तो इसे हमारी सरकारों का निकम्मापन न कहें तो और क्या कहें।