क्यों हैं राजमा प्रोटीन का दूसरा तथा कैलोरी का तीसरा सबसे बेहतर स्त्रोत है?

राज़मा (Kidney Bean)

उत्तराखण्ड के बहुमूल्य उत्पादों की श्रृंखला में आज एक ऐसे उत्पाद का परिचय कराया जा रहा है जो कि विश्वभर में परिचय का मोहताज तो नहीं है मगर उत्तराखण्ड की विशेषता के साथ शायद इसके परिचय की आवश्यकता है। पूरे विश्व में सिर्फ अंटार्टिका को छोडकर लगभग सभी जगह राज़मा का उत्पादन किया जाता है तथा ब्राजील तथा भारत विश्व में राजमा के सबसे बडे उत्पादक देश है।

राज़मा का वैज्ञानिक नाम Phaseolus vulgaris L. है जिसका वानस्पतिक अध्ययन फेबेसी कुल में किया जाता है। राज़मा को इसके अलावा किडनी बीन, रेड बीन तथा कॉमन बीन नाम से भी जाना जाता है। सम्पूर्ण विश्व में राज़मा के उत्पादन का इतिहास बहुत पुराना तथा विस्तृत है। समुद्र तल से 3000 मीटर तक की ऊॅचाई पर उगायी जाने वाली राज़मा का विभिन्न भौगोलिक परिस्थिति के साथ-साथ विशेषताऐं भी बदल जाती है।

उत्तराखण्ड में राज़मा की लगभग 20 से भी अधिक किस्में उगायी जाती हैं जो कि राज्य के अलग-अलग स्थानों में होने के कारण भिन्न हैं। उत्तराखण्ड के हर्षिल, पुरोला, चम्बा, धारचूला, पिथौरागढ, द्वाराहाट, तपोवन, रामगढ, चकराता, लोहाघाट, बैरीनाग, दूनागिरी, मुनस्यारी, मोरी, जोशीमठ, चमोली तथा रूद्रप्रयाग आदि स्थानों पर राजमा का मुख्य रूप से उत्पादन किया जाता है। प्रदेश में राज़मा स्थानीय लागों के आर्थिकी का एक बेहतर विकल्प है जिसकी स्थानीय बाजार में 200 से 250 रूपये प्रति किलो तक की कीमत आसानी से मिल जाती है। राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय खाद्यानों में उत्तराखण्ड की पहाड़ी राजमा की बेहद मांग है, जिनमें हर्षिल, पुरोला, चकराता तथा मुनस्यारी आदि की राजमा प्रमुख रूप हैं।

इन्हीं प्रमुखता एवं विशेषताओं को देखते हुये उत्तराखण्ड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकॉस्ट) द्वारा उत्तराखण्ड में उगायी जाने वाली लगभग सभी किस्मों की राजमा का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन हेतु रूपरेखा तैयार की गयी। शोध में सभी किस्मों की पौष्टिकता के साथ-साथ इसमें मौजूद पाचक एंजाइम्स alpha amylase inhibitors तथा ग्लाइकोसाइडिक क्वासरटिन का भी अध्ययन किया गया जो कि ग्लाइसिमिक इंडेक्स को कम करने के साथ बहुत से मेटाबोलिक डिसऑर्डर के प्रभाव को भी कम करने में सहायक होता है। खाद्य पदार्थों में कार्बोहाइड्रेटस की अधिक मात्रा से रक्त में ग्लूकोश का स्तर बढ जाता है जबकि उतराखण्ड की राजमा में alpha amylase inhibitors तथा ग्लाइकोसाइडिक क्वासरटिन के होने से कार्बोहाइड्रेटस का पाचन धीमा कर रक्त में ग्लूकोश का स्तर निम्न बनाये रखता है। यूकॉस्ट द्वारा किये गये शोध के अनुसार उत्तराखण्ड राज्य में उगायी जाने वाली लगभग सभी किस्मों में से जिला उत्तरकाशी में उगायी जाने वाली पुरोला किस्म में सबसे ज्यादा ग्लाइकोसाइडिक क्वासरटिन, जो कि लगभग 410 मिग्रा/कि0ग्रा0 तथा इसी किस्म की राज़मा सबसे ज्यादा alpha amylase inhibitory active पायी गयी है तथा अन्य किस्मों में पाये गये क्वासरटिन (मिग्रा/कि0ग्रा0) का स्तर निम्नवत है-

मुन्स्यारी 105
हर्षिल 50
मोरी 127
जोशीमठ 180
धनकोट 104
मजखली 92
दूनागिरी 98
पुरोला 410
द्वाराहाट 110
तपोवन 90
चकराता 53

राजमा प्रोटीन का दूसरा तथा कैलोरी का तीसरा सबसे बेहतर स्त्रोत है। राज़मा में समान्यतः 346 किलो कैलोरी, 22.9% प्रोटीन, 1.3% वसा, 60.6% कार्बोहाइड्रेट्स, 260 मिग्रा0 कैल्शियम, 410 मिग्रा0 फॉस्फोरस, 43.2 मिग्रा0 सोडियम, 1160 मिग्रा0 पोटेशियम, 183 मिग्रा0 मैग्नीशियम, 6.6 मिग्रा0 आयरन, 0.61 मिग्रा0 कॉपर, 166 मिग्रा0 सल्फर, 1.4 मिग्रा आयोडीन तथा 1.8 मिग्रा0 मैग्नीशियम प्रति 100 ग्राम तक पाये जाते है।

विश्वभर में राज़मा की मांग तथा भारत द्वारा करायी जाने वाली आपूर्ति को देखते हुए उत्तराखण्ड में भी राजमा के उत्पादन पर विशेष ध्यान देने तथा प्रदेश में उगायी जाने वाली राज़मा की विशेषताओं को मद्देनजर रखते हुए विश्व पटल पर अपनी पृथक पहचान दिलाने की दिशा में काम किये जाने की आवश्यकता है जिससे कि प्रदेश तथा स्थानीयों की आर्थिकी को अधिक सुदृढ एवं समृद्ध बनाया जा सके।

डॉ राजेन्द्र डोभाल
महानिदेशक
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद
उत्तराखण्ड।