सो रहे है प्रायवेट भगवान.

 Dehradun:कमाई वाले डेगू में रात रात भर जागकर पलेटलेट चढ़ाने वाले “प्रायेवेट भगवान” आजकल चैन की नींद सो रहे है।कोरोना जो कमाई का जरिया नहीं हो सकता उसके डर से बाहर नहीं आ रहे है।, आश्चर्य है कि शहर के लोागों के डर से को काट काट कर कमाई करने वाले जिन डाक्टर साहब लोगों की आधे से ज्यादा शहर में सम्मपतियां है। वो कोरोना की महामारी के वक्त कोई दरियादिली नहीं दिखा रहे है।साधनों के मारे सरकारी डाॅक्टर जिनको सभी कोसते रहते है,आजकल अपनी जान जोखिम में डालकर भी मरीज देख रहे है।

करोड़ों की सम्मपतियों वाले प्रायवेट नसिंग होम,व अस्पताल वालों प्रायवेट भगवान आजकल दुबक कर पता नहीं कहां छुप गये है उन्हें डर है कि कहीं कोरोना के मरीज का इलाज करते समय उन्हें भी यह बीमारी न पकड लें।डेगू की बीमारी के वक्त अपनी दुकानों को दिन-रात सजाकर रखने वाले ये प्रायवेट भगवान कोरोना की महामारी आते ही गधे के सींग जैसे गायब हो गये है। एक ओर समाजसेवी संस्थाओं से लेकर समाज के तमाम लोग सीएम राहत कोश
में अपना अपना सहयोग दे रहे है वही करोड़ो की संम्पति के मालिक प्रायवेट भगवानों ने अपने जेब से एक रूपया भी अभी तक नहीं निकाला है। तब सवाल उठता है कि इनका काम सिर्फ मलेरिया,डेगू,चिकनगुनिया जैसे मच्छरों की तरह सिर्फ आम जनता का खून चूसना है ?या इनका भी काई सामाजिक दायित्व है?इतिहास गवाह है कि अपनी उंॅची उची दुकानों को चमकदार रेस्तरा जैसा सजाकर गरीबों और असहाय लोंगों का खून चूसने वाले ये प्रायेवेट भगवान जब भी आपदा और मानव जाति पर खतरा मंडराता है तब तब अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ देते है। वही हर समय जनता और सरकार की गाली सुनने वाला सरकारी डाॅक्टर की हाॅलत रोजना करो या मरो की रहती है। भले ही सरकार ने स्वाथ्य कर्मिकों के साथ डाॅक्टरों के लिए 4 लाख प्रति कर्मचारी की व्यवस्था की है लेकिन जिस तरह से सरकारी डाॅक्टर व स्वाथ्यकर्मी अपनी जान को जोखिम में डालकर यह काम कर रहे है उस हिसाब से यह मदद  ऊंट के मुहूं में जीरा जैसी है।प्रायवेट भगवानों को  चाहिए कि देश जब खतरे में हो और जब उनकी इस वक्त सबसे ज्यादा जरूरत हो बड़ चड़ कर मानव सेवा में लग जाना चाहिए।

-भानु प्रकाश नेगी,देहरादून