कांग्रेस की डगर में चुनौतियों का अंबार।

पूर्णिमा मिश्रा


देहरादूनःदेश व  प्रदेश की राजनीति में 2014 में जिस तरह से मोदी प्रभाव रहा, उसी का नतीजा था कि विधानसभा चुनाव में भाजपा को जबरदस्त जीत मिली थी। भाजपा के मजबूत मैनेजमैन्ट को देखते हुए इस बार भी मोदी प्रभाव को तोड़ना  कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।साथ ही अपनों से पार पाना भी पाना भी आसान नहीं होगा।
गौरतलब है कि पार्टी में अपने ही अपनों के खिलाफ कई बार सामने आ चुके हैं। जिसका खामियाजा कहीं न कहीं पार्टी को स्थानीय चुनावों में भुगतना भी पड़ा है। लेकिन हालात अभी भी जस के तस हैं। हालत यहां तक खराब हो गये है कि हैं कि नाराजगियां साफ तौर पर मीडिया तक पहुंच जाती है और कई बार प्रभारी तक को सुलह करवाने के लिए देहरादून आना पड़ाता है।।हालांकि पार्टी के वरिष्ठों नेताओं ने कभी इसे खुलकर नहीं स्वीकारा कि पार्टी गुटों में तलवारें खिंच रही है।
यह बात भी किसी से छुपी नहीं है कि, कांग्रेस में नेता कम और गुट ज्यादा दिखने लगे हैं।प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और इंदिरा हृदयेश का गुट एक नजर आता है तो वहीं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत अलग गुट में नजर आते है। समय समय पर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत भी अपनी नाराजगी ट्वीट कर  अक्सर सुर्खियां बटोरते रहते है।
 ऐसे ही कई कारण हैं जिससे कहा जा सकता है कि कांग्रेस की यह चुनावी डगर आसान नहीं है।वरिष्ठ पत्रकारों की मानें तो पहाड़ में कांग्रेस कैडर के लोग जुड़े हुए हैं, जिससे वोट प्रतिशत नहीं घटा है। लेकिन कांग्रेस का प्रबंधन लचर है जो कार्यकर्ताओं व नेताओं को एक जुट नहीं कर पा रहा है।
लोकसभा चुनाव को पार करना कांग्रेस के लिए अग्निपरीक्षा की घड़ी होगी। क्योंकि पार्टी अपने प्रतिद्वन्दियों से तो बाद में लडे़गी पहले अपनों से पार पा ले। अभी कांग्रेस अपने आप को साबित न कर सकी तो आगमी समय में कांग्रेस की डगर काफी मुश्किल हो जायेगी।