पलायन न कर बनाया अनोखा जंगल,

सरकारी नौकरी से रिटायर्ड के बावजूद भी नही किया पलायन
चीड़ के पौधे उखाडकर बंजर भूमि में लगाये बांज,बुरास,काफल के पेड़
पेडों से बच्चों जैसा प्रेम करते है इंद्रसिंह
जंगल बन जाने से सूखा पानी का स्रोत फिर से हुआ जीवित

देहरादून-ऐसा नहीं कि मनुष्य अपने इस कृत्य से अनविज्ञ है लेकिन जानने सुनने के बाद पेड़ पौधों और वनस्पतियों का दोहन करता है। विश्व के तमाम पर्यावरण विद,वैज्ञानिक व बुद्धिजीवी चिरकाल से पृथ्वी को बचाने की मुहीम पर लगे हैं और साथ ही साथ आम जनमानस को भी आगाह करते आये हैं। धरती पर मानव समझ की विडम्बना ही कहेंगे कि सारे लोग आलेख के मुख्य सार प्रकृति संवर्धन पर क्षणिक ही विचार करते हैं और ज्यादा विचार केवल और केवल अपने अन्धाधुनिकरण के लिए होता है, लेकिन कतिपय पुरुष ऐसे भी हैं जो हर क्षण हर घड़ी पर्यावरण संवर्धन के लिए जीते हैं खपते हैं, इन्हीं पुरुषों में एक गुमनाम व्यक्तित्व हैं ग्राम बैरासकुण्ड जिला चमोली उत्तराखंड के इंद्रसिंह बिष्ट।

बिष्ट जी का कृतित्व वैसे कुछ नहीं जो एक आम किसान अपने हित के लिए करता है ऐसा ही मान सकते हैं लेकिन पर्यावरण संरक्षण हेतु उनका ये कार्य किसी प्रेरणा से कम नहीं है । इंद्रसिंह बिष्ट जी उम्र 82 साल है और ये ग्राम बैरासकुण्ड जिला चमोली के वासिंदे हैं, बचपन से आज तक उनका लगाव पेड़ों पोधों और जानवरों से ऐसा रहा कि जब इनकी सेवा में लग जाय तो खाना खाने तक भूल जाते हैं, उनका यह बृक्ष और जीव प्रेम तब और प्रगाड होता गया जब वे 1997 में पी. डब्लू. डी. की सरकारी सेवा से निवृत होकर घर आये। मातृभूमि प्रेम की पराकाष्ठा यह रही कि ठीक ठाक आमदनी और परिवार की मंशा के विपरीत पलायनवादी विचार को फटकने नहीं दिया और अपनी मिटटी अपने घर में अपने पैत्रिक कार्य खेती किसानी में जुट गए। इस आलेख का मूल  बिष्ट का कार्य और एक गुमनाम व्यक्ति को जीवन के रहते उनकी करनी का प्रतिफल प्रेरणा के रुप में आमजन तक पहुँचाना है।

बात करते हैं इंद्रसिंह बिष्ट के कार्य की, तो बताते जाएँ कि उनकी काफी पैत्रिक खेती बैरासकुण्ड गाँव से सटे फराणखिला मोहल्ले के साथ थनाकटे नामक तोक में है और खेती के साथ उनकी काफी जमीन उस समय बंजर थी। जिसे गाँव वाले चारागाह के तौर पर इस्तेमाल करते थे, साथ में एक बात मुख्य थी की उस जमीन पर उस समय चीड़ ने अपना साम्राज्य करना शुरू कर दिया था। बिष्ट जी ने अपने स्वश्रम से उस जमीन पर पत्थरों की घेरबाड़ की और पूरे चीड के छोटे पोंधों को उखाड़कर वहां बांज, बुरांस और कुछ काफल के पेड़ लगाने शुरू किया।

हर दिन अपने खेती के दैनिक कार्यों के चलते कभी दिन भर तो कभी घड़ी दो घड़ी उन पौधों के लिए देते गए और आज 21 साल बाद देखते देखते थानाकटे में लगभग तीन एकड़ से ज्यादा भूमि पर बांज बुंरास मिश्रित बड़ा सघन जंगल बन गया। हर किसी व्यक्ति को देखने के लिए आमंत्रित करते हैं और पेड़ों के साथ ऐसी बतियाते हैं जैसे अपने बच्चों से, हर पेड़ की जीवनी बताते हैं कब यह सूख रहा था कब इसकी जड़ों पर पग्वोर (मिटटी) लगाया, छंटनी की कब इसकी फांगे झपन्याली होनी शुरू हुई इतना अप्रितम प्रेम आम मनुष्य नहीं किसी पर्यावरण पुत्र में ही देखने को मिलता है।
वैसे उत्तराखण्ड की धरती पूरे विश्व में एक मात्र ऐसी धरती है जहाँ के भूमि पुत्रों ने चिपको और मैती जैसे पर्यावरण संरक्षण मुहिमों के तहत विश्व विरादरी को पर्यावरण संरक्षण की सीख दी।आज जहाँ उत्तराखण्ड में गोरा देवी, सुन्दरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट, कल्याण सिंह रावत मैती, विद्यादत्त शर्मा, गणेश सिंह गरीब जी आदि जैसे पर्यावरण हितेषी नामचीन नाम हैं वहीं इंद्रसिंह बिष्ट जैसे गुमनाम व्यक्ति हैं जो बिना किसी स्वार्थ के पर्यावरण रक्षा के लिए अपने जीवन को खपा रहे हैं।

बताते चलें कि  बिष्ट के इस जंगल में आज पूरे बैरासकुण्ड ग्रामवासी यदा कदा जरुरत पर अपने मवेशियों के लिए चारा व उनके बिछाने के लिए सूखी पत्तियोँ (सुतर) का इस्तेमाल करते रहते हैं और एक और चमत्कार की बात है कि उस तोक में सूख गया पानी का स्रोत बांज के चलते फिर से उभर गया है, ये बांज की की महिमा है कि जिस धरती पर बांज होगा वहां पानी का सोता और जमीन नमी वाली होती है इसी बांज के परिणीत बांज के साथ अन्य पेड़ और पादपों का खाना जंगल होता है। लेकिन आज बिडम्बना है कि क्या आम कास्तकार, क्या सरकार बांज के ऊपर ध्यान नहीं दे रही है और प्रकृति के साथ इस रूखेपन से विनाशकारी चीड़ का साम्राज्य चौड़े पत्तों वाले सघन जंगलों में अनवरत होने लग गया है।

बलबीर सिंह “अडिग“