पर्यवरण संरक्षण की अनूठी पहल में जुटी हिमवंत फाउंडेसन सोसायटी

 

भानु प्रकाश नेगी


देहरादून-प्रधानमंत्री मोदी की महत्वाकांक्षी योजनाओं में स्वच्छ भारत अभियान है।जिसके तहत देश भर में स्वच्छता अभियान को बल मिला है।वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण एक विश्वव्यापी विषय बन गया है।प्रदूषण चाहे जल,वायु का हो या ध्वनि का सभी प्रकार का प्रदूषण जीव जगत के सभी जीवों के लिए हर हॉल में खतरनाक है।दो अक्टूबर से सिग्ल यूज प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है,लेकिन प्लास्टिक के रेशे से बनाई जाने वाली चुर्नियों को जिस कदर से गंगा व साहायक नदी नालों में डाल कर गंगा सहित अनेक नदियों को प्रदूषित किया जा रहा है।इस प्रदूषण को लेकर हिमवंत फाउंडेसन सोसायटी ने बीडा उठाया है।
पर्यवरण संरक्षण में जुटी हिमवंत फाउंडेसन का मुख्य उद्देश्य गंगा व सहायक नदियों मे में डाले जा रहे सिन्थेटिक रेशे से तैयार माता की चुनरी और पोषाकों की जगह कॉटन से बनी चुनरी और पोषाकों को बाजार व मंदिरों तक पंहुचना है।जिससें उपयोग के बाद नदियों में डाली जान चुनरियों व पोषाकें नदी में डालने के बजाय बच्चों की पोशाकें,सफाई आदि के लिए काम आ सकें। हिमवंत फाउंडसन की संस्थापक संगीता थपलियाल का कहना है कि, हिला सशक्तिकरण को लेकर व पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए यह कार्य शुरू किया है।अक्सर देखा जाता है कि माता को चढाये जाने वाली चुनियां व वस्त्र गंगा जी में दान किये जाते है जिससे हमारा जल प्रदूषित हो रहा है।
स्यंम सहायता समूह में किये जा रहे इस काम में जहां महिलायें खुद काम कर स्वरोजगार को बढावा दे रही है।वहीं संस्था के सदस्यों का कहना है कि हमें यहां काम करके काफी अच्छा लग रहा है। क्योंकि हम रोजगार के अलावा पर्यावरण संरक्षण का काम कर रहे है।साथ ही जरूरतमंद महिलाओं को भी काम मिल रहा है।
माता की चुर्नियों और पोषकें अभी देहरादून में ही तैयार की जा रही है संस्था का लक्ष्य है कि यह चार धाम से लेकर हर माता मंदिर तक पंहुचें। इसके लिए संस्था की महिलाये कई दुकानां में इसे बेचने खुद ही जाती है।लेकिन उच्च गुणवक्ता और 100 प्रतिसत पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण यह अभी चायनीज व सिन्थेटिक चुनियों के मुकाबले मंहगी है।संस्था की सदस्यों का कहना है कि,हमें अभी कोई खास सहायता नहीं मिल पा रहा है। क्यांकि फुटकर विक्रेता इसमें अपना ज्यादा मुनाफा चाहते है। लेकिन हमारा उद्देश्य है कि हम ग्राहक का भी ध्यान रखे।अगर सरकार का हमें साथ मिल जाता तो हम इस मुहिम का काफी हद तक आगे बड़ा सकते हैं।
मंदिरों में चढाये जाने वाली चुर्नियों व तमाम पोषकों से जहां जल प्रदूषण का भयानक खतरा हो रहा है।वही 100 प्रतिसत कॉटन से बनाये जाने वाली चुर्निरियों व पोषाकों को पर्यावरण मित्र के तौर पर देखा जा रहा है। इन चुर्नियों को चढावे के बाद बच्चों के कपडों व महिलाओं की ड्रेस व साफ सफाई में उपयोग किया जा सकता है।वही संस्था का उद्देश्य महिला सशिक्तिकरण,बेटी बचाओं बेटी पढाओं,गंगा सरक्षण,व पलायन रोकना है।पर्यावरण वचाने की मुहिम में संस्था को सरकार का साथ मिल गया तो वह दिन दूर नहीं जब गंगा सहित कई नदियां प्रदूषित होने से काफी हद तक बच जायेगी।