पलायन आयोग की रिपोर्ट, खोदा पहाड़ निकली चूहिया!

मेरे एक साथी प्रेम बहुखंडी ने पलायन आयोग पर मुझे एक पुराना चुटकुला सुनाया, आपके साथ शेयर कर रहा हूं। एक नामी रिसर्चर ने अपने आप को एक कमरे में बंद कर दिया। कई दिन हो गये उसने दरवाजा तक नहीं खोला। लोग वहां एकत्रित होने लगे कि पता नहीं क्या खोज कर रिसर्चर बाहर आएंगे। आखिर आठ दिन बाद रिसर्चर महोदय कमरे से बाहर आए, लोगों ने उनसे पूछा कि क्या खोज की। महाशय ने जवाब दिया, यही कि यदि आठ दिनों तक कोई भूखा रहे तो बहुत भूख लगती है। उत्तराखंड पलायन आयोग का भी यही हाल है। खोदा पहाड़, निकली चुहिया। वही पुराना डाटा और कागजी कमाल।पलायन आयोग के उपाध्यक्ष डाॅ एसएस नेगी से कुछ सवाल।
ग- अंतरिम रिपोर्ट में उत्पादकता का सवाल नहीं दिया गया, न ही इस बात का उल्लेख है कि पिछले 17 वर्षों में इस दिशा में क्या किया गया।
– प्रदेश में कई एनजीओ गांव बसाने का काम कर रहे हैं, सरकार उनको ढेर सारा धन देती है। पदमश्री और पदमभूषण जैसे सम्मान भी, लेकिन क्या किसी एनजीओ ने एक गांव या एक घर भी बसाया है? फिर ऐसे एनजीओ से वसूली क्यों न हो?
– मानव-वन्य जीव संघर्ष का सवाल भी गायब रहा। जबकि राज्य गठन के बाद 200 से भी अधिक लोगों की जान चली गईं। कई गांवों से तो इसलिए पलायन हो रहा है कि वहां जो भी फसल करो, बंदर और सूअर चट कर जाते हैं।
– पहाड़ भविष्य में नेपाल कैसे बन सकता है! नेपाली हमारे यहां साख-सब्जी उगाते हैं और साल भर में अपने गांव नेपाल लौट जाते हैं। वो न हों तो हम चूल्हा भी न जला सकें क्योंकि गैस सिलेंडर और राशन भी पीठ पर लाद कर वही हमारे घरों में पहुंचाते हैं?
– अंतरिम रिपोर्ट में इस बात का जिक्र नहीं है कि कैसे एक समुदाय विशेष के लोग जोशीमठ और माणा तक बस गये हैं, और मानव तस्करी कर रहे हैं या वहां से लड़कियां व महिलाएं भगाने का काम कर रहे हैं?
– पौड़ी और अल्मोड़ा में सबसे अधिक पढ़े-लिखे हैं, वहां रोजगार भी मिल रहा है तो वहां से सबसे अधिक पलायन क्यों?
– रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र नहीं है कि तत्कालीन उत्तरप्रदेश में पर्वतीय जिलों में जनगणना के हिसाब से पाॅजीटिव रही और राज्य बनते ही नेगेटिव हो गई, उदाहरण के लिए वर्ष 1991 की जनगणना के अनुसार पौड़ी की जनसंख्या में 15.46 प्रतिशत की वृद्धि हुई जो 2001 में 3.91 रह गयी और 2011 में माइनस 1.51 चली गई? इसी तरह से अगली जनगणना में चमोली और बागेश्वर की जनसंख्या वृद्धि भी माइनस में चली जाएगी? तो क्या माना जाए, अलग राज्य हमारे लिए विकास नहीं विनाश लेकर आया?
– जल, जंगल और जमीन का सवाल भी रिपोर्ट में नहीं है। वनों के अंधाधुंध कटाव, वनाग्नि और नदियों के दोहन से पारिस्थितकीय तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में भी कुछ नहीं कहा गया है?
– जो कारण रिपोर्ट में बताए गए हैं वो सभी को पता हैं? समाधान जो है वो सरकार के वश नहीं है क्योंकि यदि आपकी रिपोर्ट का ही हवाला लें तो प्रदेश में 50 प्रतिशत से अधिक लोग पलायन इसलिए कर गये कि सरकार रोजी-रोटी देने की बजाए सिर्फ घोषणाएं करती है और कागजों में चांद पर लोगों के घर बस जाते हैं। धरातल पर तो है पलायन, पलायन और पलायन।
– एक अहम सवाल जो पलायन आयोग ने लोगों से शायद पूछा भी नहीं होगा कि पलायन में राज्य के भ्रष्टाचार का कितना योगदान है।

वरिष्ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की FB वाॅल से।