पहाड़ो में बग्वाल के मायने- एस राजेन टोडरिया

पहाड़ो में बग्वाल के मायने- एस राजेन टोडरिया
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बचपन में दीपावलि में हम लोग बैलों की पूजा किया करते थे। बैलों के पैरों की पूजा करना,उन्हे चावल का बना पींडा खिलाना, भैलुओं के गठ्ठर पर पिंठाई लगाकर उनकी पूजा करना। पूरे गांव में बच्चों और युवाओं की टोलियां जगह-जगह घूमकर भैलू जलाकर दौड़ती थीं। स्वाले,पकोैड़े खाना, जिनकी दीवाली न हो उन घरों में स्वाले,पकौड़े देनां बस इतनी ही थी हमारी परंपरागत दीवाली। गांव के उन लोगों के बीच तब तक लक्ष्मी पूजा नहीं गई थी। लोग धन की नहीं धान्य की कामना करते। पेट भरे रहें, बुरे वक्त के लिए कोठारों में अनाज हो, लक्ष्मी नहीं बैल पूजनीय थे। हां, वही बैल जिसका अपना कोई वंश नहीं होता जिसकी विरासत उसके डीएनए में नहीं बल्कि मेहनत में यात्रा करती है।
पहाड़ का समाज कभी भी कर्मकांडी समाज नहीं रहा, वह पूजापाठी समाज भी नहीं रहा,उसकी सभ्यता का यकीन भव्य मंदिर बनाने में कभी नहीं रहा। उसके देवता साधारण पत्थरों में बने छोटे-छोटे घरौंदेनुमा मंदिरों में रह सकते थे और वे इस पर नाराज नहीं होते थे। वे घर में बने छोटी सी कार्निश में रह सकते थे। उनकी मूर्तियां नहीं प्रतीक हुआ करती थी। तलवार,त्रिशूल और सांप जैसे प्रतीकों में ही ये देवता हुआ करते थे। पहाड़ के ये देवता खेतिहर समाज के देवता थे।नागराजा,नरसिंह और भगवती। भगवती उसके मातृसत्तात्मक समाज और कृषि अर्थव्यवस्था की धुरी की प्रतीक थी। बड़ द्यौ निरंकार देवता हैं जो खेती के देवता हैं। हर फसल के बाद नवान्न का पहला भोग बड़ द्यौ को ही लगाया जाता था। ये सभी उसकी अर्थव्यवस्था व उसके पर्यावरण के देवता थे। लेकिन हमने अपने इन सारे लोकदेवताओं के प्रतीकों के बजाय भव्य मंदिर बनाने और कर्मकांड के जरिये पूजा करने की पद्धति अपना ली है। शंकराचार्य के आने से पहले वर्णव्यवस्था आने से पहले पहाड़ के समाज में जो परंपरायें और विशेषतायें थीं उन्हे हम एक-एक कर भुलाते जा रहे हैं। हमारी असली लोकसंस्कृति जो हमें एक विशिष्ट मातृसत्तात्मक समाज बनाती है वह उत्तर भारत के सांस्कृतिक हमले में नष्ट हो चुकी है। हिमालय के इस अनोखे समाज और उसकी संस्कृति,उसके मिजाज व उसकी जातीय पहचान को बचाना होगा। दीपावली के दिन हमें अपनी पुरानी दीपावली की ओर भी लौटना होगा।
आप सभी को दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएं । उत्तराखण्ड के लोगों को राजेन टोडरिया जी द्वारा यह लेख दीवाली के मौके पर जरूर पढ़ना चाहिए ।