पहाड़ में कोरोना का भय

पूरी दुनियाँ में कोरोना की दहशत से लोगों में जहाँ हाहाकार मचा हुआ है, वहीं संक्रमण और बिमारी से ज्यादा लोग मनोविकार / मनोरोगों से भी पीड़ित होते जा रहे है. सोशल मीडिया पर इस तरह की ख़बरें लगातार आ रही हैं. कहते हैं कि बिमारी से ज्यादा ख़तरनाक डर होता है. जीवजगत विशेषकर मानव जीवन से जिस दिन डर ख़त्म हो जायेगा वह अपना जीवन ज्यादा सुख से बिता सकता है. आजकल इस विपदा में समाज के अन्दर के भय या डर को तमाम चिकित्स्यकीय प्रयासों के रहते दूर किये जाने के भी उपाय जरुरी है.

अपने पहाड़ी राज्य में कुछ दिनों से (दुनिया के साथ – साथ) एक अजीब से डर का वातावरण दिख रहा है. यह वातावरण राज्य से बाहर रोजी रोटी की तलाश में गए प्रवासियों के वापस अपने-अपने घर गावों के लौटने की वजह से बन रहा है. आजकल पूरी दुनिया के अधिकांश देशों के लोग अपने घरों अथवा अपने रोजगार के इलाकों में कैद हैं. लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा है. यह स्थिति कब तक बनी रहेगी कुछ कहा नहीं जा सकता. पहाड़ की अर्थ ब्यवस्था प्रवास कर रहे लोगो पर ज्यादातर निर्भर करती रही है. अब जब ये प्रवासी अपने रोजगार से वंचित हो चुके है, तो इनका अपने गावों की ओर लौटना एक मजबूरी ही है. आखिर ये प्रवासी बन्धु जाएँ तो जाये कहाँ? दूसरी ओर गावों में डर या भय यह हो गया कि जो भी बाहर देशों – विदेशों से गावं पहुँच रहे है वो कोरोना की बिमारी लेकर आ रहे हैं या वीमारी छुपा रहे हैं. सोशल मीडिया की पहुँच होने से गावों में रह रहे लोग प्रवासियों को गरिया रहे हैं तो जवाब में प्रवासी भी अपना आपा खो रहे है. गावं का प्रधान प्रशासन के दिशा निर्देशों का पालन करे, गावं की सुने या प्रवासियों के स्वास्थ का चेकअप करे.

एक बड़ी सामाजिक समस्या आजकल पहाड़ के गावों में खड़ी हो चुकी है, ऐसी स्थिति अमूमन सभी जगहों की है चाहे वह मैदान हो या पहाड़. चुनावों ने पहले ही ग्राम समाज को टुकड़े – टुकड़े में बाँट रखा है और अब कोरोना के डर ने यह खायी और गहरी कर दी है, जिस पर सामाजिक चिंतकों को आने वाले कठिन समय मै काम करने की जरुरत आन पड़ी है. गावों में रहने वाले व प्रवासियों दोनों लोगों को धैर्य से सोच विचार कर इसका हल निकालना चाहिये. हल एक ही है पहले तो दोनों एक दुसरे का आदर करे, एक दुसरे की समस्या को समझें, जो भी प्रवासी घर आ रहे हैं वो अपने स्वास्थ की जांच जरुर करवायें, ग्राम प्रधान को जरुर सूचित करें, घर पहुचने के बाद भी नियत समय तक एक सामाजिक दुरी बनायें रखें, घर वालों से मेलमिलाप की जल्दबाजी न करें. इससे गावं में सुरक्षा व विश्वास का वातावरण बनेगा.

अंत में सभी से यही अपील होगी कि प्रवासियों व गावों के बीच विभेद, मतभेद, ग्राम समाज को क्षति पहुचाने वाले वीडियो, लाइव वीडियो, लेख, टिपण्णी, चुटकले, ऑडियो क्लिप, चित्रों को फेसबुक, व्हट्सएप, मैसंजर को हतोत्साहित करे व शेयर तो बिलकुल भी न करें. (शेष जारी…..)

“वेब पहाड़नामा” के लिये जयप्रकाश पंवार ‘जेपी’