नगर निगम सफाई क्रमिकों को मिला झाडू का सहारा

//भानु प्रकाश नेगी//

अपनी न्युनतम मजदूरी 285 रूप्ये और संविदा पर सफाई कर्मचारियों की भर्ती की मांग को लेकर एक सप्ताह से अधिक समय से अपनी मांगों पर अडे सफाई कर्मचारियों को आमआदमी पार्टी का समर्थन मिल गया है। सफाई क्रमिकों की मांगो को जायिज ठहराते हुए आम आदमी पार्टी की नेता उमा सिसोदिया ने कहा कि नगर क्रमिकों की इतनी मामूली सी मांग भी अगर सरकार पूरी नही कर सकते तो डब्बल इंजन सरकार का क्या फायदा।उन्होनें सरकार पर सफाई क्रमिकों के उत्पीडन का आरोप लगाते हुऐ कहा कि एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी स्पच्छ भारत अभियान की बात करते है वही दूसरी ओर सफाई क्रमिकों को उचित मेहनताना देने से कतराते है।


वही कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता डांॅ.आर.पी रतूडी के का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी स्वच्छ भारत अभियान का डंका पीटते है वही दूसरी ओर उन्ही की सरकार में नगर निगम कूडें के ढेर में तब्दील हो गया है। मेयर विनोद चमोली का 10 सालों का कार्यकाल पूर्ण रूप से निरासा जनक रहा है। भाजपा की सरकार देहरादून शहर में महामारी फैलाना चाहती है। कर्मचारियों की जायज मांगों को यथा शीध्र मानकर समस्या का समाधान तत्काल किया जाना चाहिए।


नगर निगम के कर्मचारी नेता राजीव कुमार का कहना है कि हमारी न्युनतम मजदूरी 285 रूपये की मांग 12 सालों से चली आ रही है जो वर्तमान सरकार भी नही मान रही है । उल्टा हमंे धमकाया जा रहा है कि हडताल वापस लो वरना आपको नौकरी से हटा दिया जायेगा। लेकिन हम अन्तिम दम तक अपनी मांगों पर अडिग है। इसके लिए जनता को भी हमारा साथ देना चाहिए।
भाजपा नेता खजानदास का कहना है कि सफाई क्रमिकों की जायज मांगों को यथा शीध्र माना जायेगा। क्योंकि कुछ मांगों को अम्लीजामा नही पहनाया जा सकता है जिस पर वह लिखित रूप से देने पर अडंे हुये है। जो यथा शीध्र संभव नही हो सकेगा। शहर की सफाई व्यवस्था के लिए किया जायेगा। क्यांेकि समस्या दिन प्रतिदिन बडती जा रही है जल्द प्रशासन स्तर पर भी समस्या का समाधान निकाला जायेगा।
बहरहाल कूढे के ढेर मंे तब्दील हो चुके शहर में राजनीतिक का खेल भी शुरू हो चुका है। जिसमें विपक्षी पार्टियों अपनी अपनी राजनीति की रोटियों सेकने लगी है। शहर भर में फैले कूढे से आम आदमी का जीना मुस्किल हो गया है। गर्मीयों का मौसम होने के कारण शहरवासियों को अब महामारी का डर भी सताने लगा है।सरकार और सफाई क्रमिकों की लडाई के बीच फंसा आम आदमी का शहर में दम घुटने लगा है।