मसरूम उत्पादन में उत्तराखंड के बढ़ते कदम

भानु प्रकाश नेगी,देहरादून
मसरूम उत्पादन में उत्तराखंड देश के अग्रणी राज्यों में सुमार है। यहां पर मसरूम के कई बडे सेन्टर है जिनमें कई मसरूम कम्पोस्ट प्लांट भी अब तैयार किये जा रहे है। मसरूम के लिए मुख्य तह बाजार मे बटन मसरूम ही चलन में होता है क्यों यह जल्दी से खराब नहीं होता है। लेकिन यह मसरूम कम्पोस्ट की खाद और अन्य रसायन को मिलाकर तैयार किया जाता है। जिससे उगने में लगभग 25 दिन लग जातें है।

मसरूम की खेती पिछले कई सालों से करने वाले कास्तकार दीपक उपाध्याय बालावा क्षेत्र में स्वरोजगार की मिसाल बन चुके है। उनका कहना है कि यह बंद कमरें में उगाई जाने वाली खेती है।रोजगार की दृष्ठि से भी बहुत फायदे मंद है। साथ ही इसमें नुकसान ना के बराबर है। मसरूम अपस्टर,मिल्की,व बटन तीन प्रकार का होता है।
मसरूम की खेती बेरोजगार व रिटार्यड कर्मचारियों के लिए काफी फायदे मंद हैं जिसमे जंगली जानवरों या प्राकृतिक आपदाओं का किसी भी प्रकार का डर नही होता है।2015 में सेना से सेवानिवृत कास्तकारात्र वाले विवेक उनियाल का कहना है कि बटन मसरूम के उत्पादन में काफी समस्या का सामना करना पड रहा था।जिसके लिए क्षेत्र के सभी कास्तकारों ने एक जुटता के दिखाई है।और बटन मसरूम की कम्पोस्ट प्लाट का कार्य शुरू किया गया है जिससे छोटे कास्तकारों को अपना काम शुरू करने में मदद मिलेगी।
ओयस्टर मिल्की, मसरूम विशुद्व रूप से जैविक होता है और इसमें किसी भी प्रकार का काई रसायन नहीं मिलाया जाता है। इसे उगाने का सबसे अच्छा तरीका होता है। इसमें भूसे को उबालकर जीवाणु रहित किया जाता है।और फिर बैग में डालकर मसरूम उगाया जाता है।यह मसरूम हड्डियां व सेल्स डबल्पमेंट में सहायक होता है।