-लोकभाषा के संरक्षण के लिए अंन्तिम सांस तक काम करूंगीःसुमन गौड़

-लोकभाषा के संरक्षण के लिए अंन्तिम सांस तक काम करूंगीःसुमन गौड़
-ल्या ठुगांर,व मेजर निराला बडे परदे पर भी अभिनय कर चुकी है सुमन गौड।
-बडी मां,दरौल्या,काफल,अब त खुलली रात,बगोट तिकणम बाज,प्रधानी बौ प्रमुख फिल्में।
-उर्मिला,लव गुरू भैजी है आने वाली फिल्म।
-पांच सौ से भी अधिक हास्य बीडियों हो चुके है जारी।


कभी रामलीला में भजन गाकर लोगों का मनोरंजन करने वाली गांव की उस साधारण बालिका सुमन बुढाकोटी गौड़ ने कभी सपने में भी नही सोचा होगा कि गढवाली जीवंत कथानकों पर आधारित हास्य व्यंग के जरिये वो इतने प्रसिद्व हो जायेगे कि हर उत्तराखंडी के दिलोदिमाग में छा जायेगें।पौडी गढवाल के सुनकटला गांव में बिशेवषर दत्त बुड़ाकोटी व स्व. सुशीला देवी बुड़ाकोटी के घर 10 मई 1975 को जन्मी सुमन गौड की शिक्षा 12 तक हुई और सुद संभालते ही 28 मई 1994 को सुभाष चन्द्र गौड़ के साथ परिणय सूत्र में बंध गयी। आवश्यक मजबूरी के कारण शादी के तीन साल बाद दिल्ली जाना पढा और अब बर्तमान समय में गाजियावाद में निवास करती है।


लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी को अपना आर्दश मानने वाली सुमन गौड का कहना है कि शहरों में रह कर अपनी लोकभाषा और संस्कृति को नही भूलना चाहिए। नये लोक कलाकारों को अपनी भेष-भूषा पर ध्यान देना चाहिए। अभिनय के अलावा लेखन व गायन में भी सुमन गौड की विशेष रूचि है। पहली फिल्म नौनु से प्यारू नाती के बाद सुमन ने अभिनय क्षेत्र मे पीछे नही देखा और एक से बढ़कर एक फिल्मों में लगातार काम करना शुरू कर िंदया िंजसमें बडी मां,दरौल्या,काफल,अब त खुलली रात,बगोट तिकडणम बाज,प्रधानी बौ प्रमुख है साथ ही अभी तक दो बडे परदे की फिल्म ल्यॉं ठुगांर,मेजर निराला में अपने अभिनय का लोहा मनावा चुकी है। सुमन गौड़ की आने वाली कुछ फिल्मों में उर्मिला,लव गुरू भैजी,आदि है।


सुमन गौड़ फिल्मों के अलावा लगातार पांच सौ से भी अधिक हास्य वीडियों व लधु फिल्मों में चार साल से काम कर रही है।दिल्ली,मुम्बई,उत्तराखंड के अलावा कई राज्यों में लाईव सो, लाईव कॉमेडी कर चुकी है। इनका कहना है कि मातृभाषा का संरक्षण व उसे अपनी नई पीड़ी तक पंहुचाना उनका मुख्य उदेश्य है। लोग लाईव कॉमेडी की बजह से उन्हें ज्यादा जानने लगे और यह तब संभव हुआ जब एक कार्यक्रम में हिमालयन न्यूज में उनकी मुलाकात लेखक निदेशक और हास्य व्यंग अभिनेता भगवान चंद से हुई उनके साथ पहली लधु फिल्म के बाद उन्हें मेरा काम बहुत पसंद आया और तब से लगातार चार साल से वह उनके साथ काम कर रही है। अपने पिताजी रंगकर्मी विश्वेश्वर दत्त बुडाकोटी से अभिनय की सीख ले चुकी सुमन का कहना है कि वह लोकभाषा के संरक्षण व उसे नई पीडी तक पंहुचाने के लिए अंतिम सांस तक काम करेंगी। मुझे खुशी है कि हमारे प्रयास रंग ला रहे है और आज हमारी नई पीड़ी हमारे डायलॉग को हम से कहते है तो बहुत अच्छा लग रहा कि उन्हें अपनी लोक भाषा से प्रेम बढ रहा है। यह हमारे छोटे-छोटे प्रयासों का से हो पा रहा है।

लोकभाषा के संरक्षण में मीडिया की बडी भूमिका है,जिसको प्रचारित और प्रसारित करने की आवश्यक है,तभी हमारे प्रयास सफल हो पायेगें जो कलाकार इस दिशा में काम कर रहे है उन्हें प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है जिससे वह दुगुनी गति से काम कर सके। लोक भाषा के सरक्षण के लिए अपने घर,समाज के सार्वजनिक समारोहों में लोकभाषा और विशेष पहनावा को बडावा मिलना आवश्यक है साथ ही स्कूलों में शिष्टाचार के शब्दों के अलावा नौतिक शिक्षा की तरह एक पाठ लोकभाषा का अनिवार्य होना चाहिए तभी अच्छे परिणामों की आशा की जा सकती थी।हमें अपनी नई पीड़ी को अपने गौरवमयी इतिहास के बारे में बताने की आवश्यकता है ताकि वे जान सके कि हमारे पूर्वज साधारण लोग नहीं थे।तभी हम आगे बड पायेगें और अपने विलुप्त होती लोकभाषा और संस्कृति को बचा पायेंगें।

-भानु प्रकाश नेगी।