लद्दाक के लोगों के लिए ये शुबह कितनी सुहानी है !

लद्दाख के लिए नई सुबह……



वेद विलास उनियाल


लद्दाख के जीवन पर ज्यादा निगाहें नहीं गई है। इस क्षेत्र को बाहरी लोग जितना कुछ समझ पाएं उसमें उन फोटोग्राफरों का बडा योगदान है जिन्होंने वहां के दुर्गम और सुंदर इलाकों में जा जाकर तस्वीरें कैद की। इसलिए रुई की फांह सी बरफ, बर्फ की सफेद बिछी चादरें, याक और जंगली भेडें, सुंदर स्वच्छ क्रिस्टल सी नीली झीलों बौद्ध मठों और लद्दाख के लोगों के चित्रों में ही इसकी झलक मिलती रही। ज्यादातर सैलानी श्रीनगर से अलग घूमने फिरने के लिए ज्यादा सोच पाए तो गुलमर्ग सोनमर्ग तक ही घूम फिर कर आए। लेह लद्दाख तक पहुंचने वाले विरले लोग रहे। बेशक इस धरती में दूसरे क्षेत्रों की तरह हरियाली वनस्पति न खिलती हो लेकिन यहां का अपना अलग सौंदर्य रहा है। नीरव सी शांति के साथ यह धरती भले ही लोगो को अपने यहां आने का आमंत्रण देती रही है, लेकिन इसने विरल दुख सहे हैं। दूर दराज के इलाके अक्सर उपेक्षित हो जाते हैं। लेकिन जम्मू कश्मीर में लद्दाख क्षेत्र को केवल अपने दूरदराज या सीमांत होने की उपेक्षा नहीं झेलनी पडी बल्कि उसे परिस्थितियों हालातों के चलते ऐसी सीमाओं में जकड लिया गया कि उसकी स्थिति बेचारगी की रही।

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कश्मीर के मसले में लद्दाख क्षेत्र के लोगों ने पिछले कई दशकों से पल पल महसूस किया कि उनके साथ शोषण होता है। और इसके पीछे कहीं न कही जन्मी कश्मीर को मिले वो विशेषाधिकार हैं जिनके दायरे में कश्मीरी नेता लद्दाख का पूरी तरह शोषण कर जाते हैं। अनुच्छेद 370 और 35 ए के दायरे में समूची ताकत कश्मीर घाटी के नेताओं के पास सिमटी रही। इसी दायरे में लद्दाख के लोगों के हक भी छीने गए। यहां तक कि रोजगार में, उद्यम में शिक्षा में पूरी तरह सौतेला बर्ताव होता रहा। राजनीतिक ताकत और रसूख पाए कश्मीर के नेताओं ने सारी सुविधाओ हकों से इस क्षेत्र को वंचित रखा। जम्मू की अपनी ताकत रही कि लडझगड कर किसी तरह किसी स्तर पर ही सही कुछ हासिल होता रहा । लेकिन लद्दाख को हमेशा ताकता रहा।

हालात यहां तक रहे कि राज्य के जो खास नेता कश्मीरियत और कश्मीर की बात करते रहे उनके लिए कश्मीर केवल दो तीन जिलों तक सिमटा रहा। लेह लद्दाख की भावनाओं को समझने, सोचने की जहमत उन्होंने कभी नहीं उठाई। और इसकी साथ जुडी बिडंबना यह कि कश्मीर की चर्चाओं में बहसो में लद्धाख का जिक्र उभर कर नहीं आया। यह जरूर था कि पुनून कश्मीरियों को भले ही न्याय न मिल पाया हो लेकिन अलग अलग मंचों पर संवादों में, आंदोलनों में पुनून कश्मीरियों की पीडा दुख दर्द की बाते उठती रही है। बल्कि जब भी कश्मीर का सवाल उठा तो आतंकवाद कश्मीर घाटी पुनून कश्मीरियत आदि बातों के इर्द गिर्द ही बातें उठती रही। लेकिन इस पूरे मसले में लद्दाख और वहां का जीवन किस तरह प्रभावित होता है इस पर गौर नहीं हुआ। यहां तक कि 1962 के चीन युद्ध की कसक उत्तराखंड और नेफा की तरह लद्दाख में है।

संसद में कश्मीर पुनगर्ठन बिल पर बहस के दौरान लद्दाख के युवा सांसद जामयांग शेरिंग ने प्रभावशाली ढंग से लद्दाख से जुड़े जिन पहलुओं का उल्लेख किया, वह कोई नई बात नहीं थी, संसद या दूसरे मंचों पर इन मसलों को उठाया जाता रहा है। लेकिन जामयांग ने जिस प्रभावी शैली में सिलसिलेवार ढंग से पूरी सामस्या को सामने रखा वह सबको झकझोर गया। साफ है कि वह ऐसे बिंदुओं पर बोलते गए जिससे एक अनुच्छेद के दायरे में एक समाज लगातर उपेक्षित होता गया उसका शोषण होता गया। इसलिए उन्होंने यह बात पुरजोर ढंग से उठाई कि केवल लद्धाख का लेह क्षेत्र ही नहीं करगिल के इलाके में भी लोग केंद्रीय शासित प्रदेश के हिमायती रहे हैं। वह ध्यान दिलाना नहीं भूले कि पूर्व गृहमंत्री राजनाथ सिंह के लद्दाख आने पर विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों की वार्ता में सबने केंद्र शासित प्रदेश की मांग की। इसमें कुछ मुस्लिम संगठन भी शामिल थे। स्पष्ट है कि लद्दाख से कश्मीर से अलग होने की मांग शोषण से मुक्ति और अपने विकास के नए आयाम तलाशने के लिए ही होती है। वहां के लोगों का भरोसा कश्मीर के उन नेताओं पर नहीं रहा जो उनके हितों के हमेशा प्रतिकूल रहे है। ऐसे नेता और अलगाववादियों के सुरों में उन्होने बहुत अंतर नहीं पाया। लद्दाख में विकास नही हो पाया। जम्मू तो लड़ झगड़कर कुछ हासिल कर भी पाया लेकिन लद्दाख के लिए कुछ न बचा। ऐसे में जब केंद्रीय गृहमंत्री सदन में राज्य पुनर्गठन बिल लेकर आए तो लद्दाख में खुशियां अलग तरह से देखी गई। जनप्रतिनिधियों से लेकर आम लोगों का उत्साह यही दिखाता रहा कि इसी दिन का वे दशकों से इंतजार कर रहे थे। एक साथ लिए कुछ फैसलों से लद्दाख के कई बंधन कट गए। आने वाली व्यवस्था में वह कश्मीर के नेताओं के भरोसे नहीं रहेंगे। जम्मू कश्मीर की तरह बेशक लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा नहीं होगी लेकिन वहां प्रशासन अपने स्तर पर क्षेत्र के विकास के लिए काम करेगा। वह घाटी और घाटी के चंद नेताओं का मोहताज नहीं होगा। खासकर केंद्र ने भरोसा दिलाया है कि लद्दाख को नए सिरे से संवारा जाएगा वहां पर्यटन विकास पर ध्यान दिया जाएगा।

खासकर इस क्षेत्र से जुडे सरोकार हैं कि इसे बौद्धिज्म केंद्र के रूप में विकसित किया जाना है। इस क्षेत्र की परंपरा और संस्कृति में यहां के मठ, शांति स्तूप इसे अलोकिक रूप देते हैं। फिल्मों के लिए कश्मीर की वादियों की तो बात की जाती है। लेकिन फिल्म या साहसिक पर्यटन लद्दाख के लिए एक नए द्वार खुल जाएंगे। कश्मीर और लद्दाख दो प्रकृति के कुछ अलग लेकिन सुंदर से नजारे फिल्म टीवी के रुपहले पर्दों में नजर आएंगे। खुबानी अखरोट से लकदक यह क्षेत्र रोबिन रेड स्टार्ट रेबेन जैसे पक्षियों का कलरव सुनने का अवसर देगा। लेह के परंपरागत सुंदर बाजार , पेंगोम झील जास्कर नदी, खारदुंग ला, पथर साहेब फुगताल मठ , लेह पेलेस, हेमिस गोंपा तीर्थ ,कारगिल के इलाके पर्यटकों घुमक्कडों को आमंत्रण देता लद्दाख क्षेत्र अपना विस्तार पाता है। मेजबानी में सिंधु नदी के वासी लद्दाख के लोगों का कोई जवाब नही। हिमालय ने लद्धाख में बादलों को बरसने से रोका है, लेकिन उसके पानी की व्यवस्था सर्दियों की बफर्वारी करती रही है। लद्दाख के कठिन जीवन में कई विषमता जटिलता रही है लेकिन यहां के लोग हमेशा शांतिप्रिय रहे हैं। जैसी परिस्थितियां रही उसके अनुकूल अपने को ढाला। अब महसूस हो रहा है कि उनका जीवन बदलेगा। प्रकृति की विषमताओं से तो एकदम नहीं लडा जा सकता, लेकिन जीवटता और सही नीतियों भावनाओं के साथ लद्दाख को उसके जीवन के अनुरूप बहुत कुछ सजाया संवारा जा सकता है। यह अध्यात्मिक भूमि है, प्रकृति वहां रहस्यों में खिलखिलाती है। मानें तो लद्दाखवासियों के लिए नई सुबह आई है।