कोरोना या करूणा?-डा. एनएस बिष्ट,

कोरोना या करूणा?—-डा. एनएस बिष्ट, कोरोनेशन अस्पताल
कोरोना के उल्टे पिरामिड से होगी कोरोना की उल्टी गिनती
कोरोना या करूणा? आज विश्व में करूणा ही करूणा व्याप्त है। सारे राष्ट्र बंदी के कगार पर हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा रही है।संचार की जिस वैश्विकता से हम पास-पास आए थे। आज उसके बावजूद हम साजाजिक दौर्य भोगने को मजबूर हैं। यह कोरोना की करूणा आयी कहां से?वायरस या विषाणु सजीव और निर्जीव के बीच की कड़ी है। और किसी भी जीव को जिंदगी और मौत के संकट से उलझा देना ही उनकी प्रवृत्ति है। असल में शरीर के बाहर भी शरीर के अवयवों (जैसे थूक, बलगम, रक्त) में वो कुछ समय तक जिंदा रह जाते हैं। यही उनसे निदान पाने में सबसे बड़ी बाधा है। (समस्या यह नहीं है कि वायरस फैलता है-समस्या यह है कि वायरस शरीर के बाहर भी छुपा रह सकता है।)
वायरस यह परिभाषित करते हैं कि हमारा आपस में संपर्क कैसा हो। मनुष्य एवं जानवरों में यही फर्क है। वास्तव में वायरस ही हमारी सूक्ष्म चेतना है। वायरस हमें बार-बार जीवन मरण के द्वंद में उलझाकर रखता है। ताकि हम अपने भीतर के विरोधाभासों की तरफ झांक सकें। व्यक्ति एवं समष्टि की उलझनों से प्रत्यक्ष हो सकें। यह एक मानवीय करूणा है आप इसे कोरोना भी कह सकते हैं।
तो फिर कोरोना की करूणा से निदान कैसे हो?शारीरिक संघ में रहकर हम मानव जाति के रूप में जिंदा नहीं रह पाएंगे। किंतु मनोवैज्ञानिक संघ में एक साथ रहकर हम पूरे विश्व के प्राण बचा सकते हैं। सामाजिक दूरी केवल शारीरिक दूरी है। यह भावनात्मक और मानसिक अलगाव नहीं बन जाना चाहिए। इस आवश्यक बुराई से बचना ही होगा। भय और संत्रास के इस माहौल में ज्यादा से ज्यादा लोग खुद को प्रबंधक के रूप में देखें।ताकि अपने आसपास के परिवेश में प्रतिरोध के उपाए सुझा सकें। सिर्फ रोगी के संपर्क में आने वाले डॉक्टर ही खुद को डॉक्टर के रूप में देखें।
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(डिजाइन पिरामिड है,जिसके अंदर यह प्वाइंटर आने हैं)
1-उपरोधन
(प्रशासनिक, यांत्रिकीय प्रबंध)
नोट—(उपरोधन और प्रशासनिक यांत्रिकीय प्रबंध एक बॉक्स के अंदर ऊपर नीचे आने हैं)
2-उपचयन
नोट–(TRIAGE या छंटनी)( उपचयन और TRIAGE या छंटनी एक बॉक्स के अंदर ऊपर नीचे आने हैं)
3-उपकरण
नोट–(व्यक्तिगत सुरक्षा के परिधान) (उपकरण और व्यक्तिगत सुरक्षा के परिधान एक बॉक्स के अंदर ऊपर नीचे आने हैं)
4-उपचार
नोट—(अस्पताल या डॉक्टर द्वारा देखरेख)(उपचार और अस्पताल या डॉक्टर एक बॉक्स के अंदर ऊपर नीचे आने हैं)
यह उल्टा पिरामिड हर जगह (अस्पताल, स्कूल , घर) पर लागू हो सकता है। उपचार वरियता क्रम में सबसे नीचे है और प्रतिरोध का प्रबंधन सबसे ऊपर है।

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हमारे भीतर का वो मक्कार जो दूसरों को घिरा पाकर खुद के बचे होने में संतोष की सांस लेता है-इस बार मर ही जाना चाहिए। कोरोना के इस दौर में नवयी करूणा का आविष्कार होना ही चाहिए। कोरोना किसी दवा या वैक्सीन के रूप में नहीं बल्कि पारस्परिकता, सामुदायिकता के रूप में उपजनी चाहिए। वायरस जो हमसे छीन लेना चाहता है-सद्भाव और संभाव-हम वो कदापि न होने दें। हाथ धोने के मानसिक रूप से भी बचना होगा जिसे ‘हाथ झाड़ना‘ भी कहते हैं। खुद को बचाने की दौड़ में पड़कर कोई भी खुद को सुरक्षित नहीं रख पाएगा। क्योंकि वायरस शरीर के बाहर भी है। सामाजिक दौर्य(social distancing) से ज्यादा निस्वार्थभाव (self distancing) की जरूरत है।
यह वक्त है तकनीक के सही इस्तेमाल का। तकनीक घूमनी चाहिए न कि रोगी और तीमारदार। यथासंभव रोगी को उसी के स्थान पर सही परामर्श मिले। तकनीक के माध्यम से वायरस से जीता जा सकेगा।यह भी ध्यान रहे कि भाषा तकनीक का सबसे अहम हिस्सा है। अंग्रेजी शब्दों के भ्रमजाल में न पड़कर स्थानीय भाषाओं में सही संवाद करना होगा। तभी कोरोना की व्यापक करूणा से मुक्ति संभव है।

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संक्रमण से संग्राम। (नोट–शीर्षक मोटे में करना है और नीचे लिखे मैटर को उल्टे पिरामिड के डिजाइन बनाकर उसके अंदर रखना है )।
-प्रतिरोध (आइसोलेशन)
-प्रबंध (प्रशासनिक)
-प्रशिक्षण (रोगी, उपचारक)
-परिचर्चा (वैज्ञानिक आधार)
-प्रक्षालन (हैंड वाशिंग)
-प्रसाधन (सेनेटाइजर)
-परिचर्या (इलाज)
उपरोक्त में वरीयता क्रम में प्रतिरोध को सबसे ऊपर रखा गया है। जो कि ज्यादा से ज्यादा लोगों की जिम्मेदारी है। इलाज में भागेदारी सबसे कम लोगों की होगी।
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द्वारा–डा. एनएस बिष्ट, सीनियर फीजिशयन, जिला कोरोनेशन अस्पताल देहरादून