तीरथ खंडूरी के शिष्य नहीं.

जयप्रकाश पंवार:

जेपीमीडिया में बार – बार इस बात को लिखा जा रहा है की तीरथ सिंह रावत जनरल खंडूरी के चेलेया शिष्य है. इतिहास गवाह है कि अगर ऐसा होता तो कोई भी सच्चा गुरु अपने पुत्र पुत्रियों सेज्यादा तवज्जो अपने शिष्यों को देता, लेकिन खंडूरी जी का अभी तक का रवेया इस बात कीतस्दीक नहीं करता. पहले अपनी पुत्री को जमे जमायी विधायक का टिकट काटकर विधायकबनवाया, जब बेटे को पार्टी का टिकट नहीं दिलवा पाये तो अन्दर खाने कांग्रेस से सेटिंग करटिकट दिलवा दिया. बेटे मनीष के राजनीतिक भविष्य के लिए क्या परिवार में चर्चा विचारविमर्श नहीं हुआ होगा ? क्या विजय बहुगुणा को टिकट नहीं मिलने पर रिश्तेदारों में अब मनीषको जिताने के लिये ड्राइंग रूम को वार रूम नहीं बनाया गया होगा ? क्या सारी रिश्तेदारीविरादरी व खंडूरी जी के भक्तों को सन्देश नहीं दिया जा रहा होगा ? ऐसे सन्देश तो मनीष केकांग्रेस में शामिल होने के दौर से ही मिलने लगे थे. जब जनरल साहब तीरथ के नामांकन सेनदारत रहे. पौड़ी के घर पर कांग्रेस का झंडा लगा दिया. अगर खंडूरी जी वाकई फौजियों केहितैषी होते तो कर्नल कोठियाल के लिये टिकट की वकालत करते. दरअसल खंडूरी जी भी अन्यराजनेताओं की तरह ही पारिवारिक राजनीती के पोषक है यह बात साबित हो चुकी है और यहउनका ब्यक्तिगत मामला है.यह देश के मतदाताओं के सामने एक बड़ी चुनौती है की नेताओं की पारिवारिक राजनीतिकविरासत को चुनौती देने वाले संघर्षशील, ईमानदार नेताओं को कैसे चुने. सभी राजनीतिक दलों मेंहाई कमान से नेताओं के बेटों को टिकट देकर जनता में थोपने का शिलसिला चल रहा है, ऐसेमें तीरथ रावत जैसे जमीनी नेता को टिकट मिलने पर इस तरह की राजनीति करने वालेपरिवारों में भारी तिलमिलाहट है और इसको जनता भी भाप रही है. तीरथ रावत ने अपनीराजनीतिक जमीन व पहचान खंडूरी जी की छत्र छाया में नहीं बनायीं, बल्कि खंडूरी जी के लिएजमीन तैयार करने में तीरथ व उन जैसे हजारों कार्यकर्ताओं व स्वयंसेवकों का योगदान है.जिनके कन्धों पर बैठकर खंडूरी जी की अब तक की राजनीति फलीभूत हुई. जनरल साहब तोऊपर से टपके थे. मुझे याद है जब खंडूरी जी भाजपा के एक रुपये के भी सदस्य नहीं थे, उसवक़्त तक तीरथ रास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् केसंघठनकर्ता के रूप में एक दसक गुजार चुके थे. तो कोई कैसे कह सकता है कि तीरथ जनरलखंडूरी के चेले हैं ? तीरथ श्रीनगर के गोला बाज़ार स्थित संघ कार्यालय में लुंगी पहनकर वखिचड़ी खाकर आज की भाजपा के लिये जमीन तैयार कर रहे थे.

जब विस्वविध्यालय व डिग्रीकॉलेजों में विद्यार्थी परिषद् का नाम लेवा नहीं होता था, तब तीरथ ने छात्र संघ चुनाओं मेंहिस्सा लेकर व जीत दर्ज कर उत्तराखंड में भाजपा की नीव रखी थी. बाद में विद्यार्थी परिषद्की जीत का यह सिलसिला पुरे राज्य में फैला. विधानसभाओं के चुनाओं के लिये तीरथ सहितहजारो कार्यकर्ताओं की मेहनत की बदोलत ही उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें बनीजो बर्तमान में भी है. अगर पार्टी ने तीरथ को लोकसभा का टिकट दिया है तो कोई एहसान नहींकिया बल्कि एक सही राह पकड़ी है इससे भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं में जोश का माहोल दिखरहा है. आम जमीनी कार्यकर्ताओं में यह सन्देश जा रहा है कि मेहनत व समर्पण का फल जरूरमिलता है. तो ऐसे में कोई कैसे कह सकता है की तीरथ रावत खंडूरी जी के चेले है ?

श्रीनगरकी धरती से छात्र राजनीति व संघटन के विस्तार के परिणामस्वरूप 1993 में आँध्रप्रदेश केहैदराबाद के विद्यार्थी परिषद् के रास्ट्रीय सम्मलेन में तीरथ रावत को परिषद् का रास्ट्रीयमहामंत्री बनाया गया. उस दौर में एक पहाड़ी गरीब घर के बेटे व पहाड़ी युवाओं के लिये एकबड़ी उपलब्धि थी. तीरथ रावत, कैलाश बहुगुणा, मनोहरकांत ध्यानी, धन सिंह रावत जैसेकार्यकर्ताओं के कन्धों पर बैठकर ही खंडूरी जी लोकसभा पहुचे थे. जिसमे मनोहरकांत ध्यानी कोबलि का बकरा बनना पड़ा था. उत्तरकाशी के भूकंप में राहत कार्यों में तीरथ रावत के योगदान कोआज भी उस दौर के छात्र याद करते हैं. उत्तराखंड राज्य बनने के दौरान से पहले फिर पार्टी नेउनपर भरोषा जताया व गढ़वाल से ऍम. एल. सी. बनाया, राज्य निर्माण के पश्चात तीरथ रावतपहले शिक्षा मंत्री बने व हजारो शिक्षा मित्रों की नियुक्ति की जो आज सरकार में सेवारत हैं. वेअपने गृह शीट चौबटआखाल से विधायक चुने गये. भाजपा के प्रदेश अद्यक्ष बनकर पार्टी कोमजबूत किया. अब अगर ऐसे में कोई कहे या सन्देश फैलाये की तीरथ रावत खंडूरी साहब केचेले या शिष्य है तो ये बात कैसे हजम की जा सकती है. क्या तीरथ रावत व उन जैसे भाजपाकार्यकर्ताओं को केवल जनरल साहब, उनकी पुत्री, और बेटों के लिये खिचड़ी खाकर भोट मांगतेरहना चाहिये? दरी बिछाने, पानी पिलाने, झंडे – डंडे बोकने, पोस्टर चिपकाने का जिंदगी भरकाम करना चाहिये. अगर खंडूरी जी भाजपा के सच्चे सिपाही व विचारधारा को मानते है, तोउनको तीरथ का चुनावी मंचों पर व मीडिया में खुलकर सहयोग करना चाहिये. सूचनाये छनकरआने लगी है कि जनरल साहब खुलकर अपने पुत्र मनीष के सपोर्ट में आने वाले हैं. ऐसे में कोईकैसे कह सकता हैं कि तीरथ खंडूरी जी के शिष्य है ????? द बोला बल. बहरहाल तीरथ सिंहरावत व मनीष खंडूरी को सुखद राजनीतिक भविष्य के लिये सुभकामनाएँ. उत्तराखंड मेंपरिवारवाद की राजनीति का खात्मा हो व सभी राजनीतिक पार्टियों में जमीनी कार्यकर्ताओं कोउनका हक मिले.लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार है.