करवा चौथ और उत्तराखंड!

विविधताओं वाले देश में ऐसा कोई माह नहीं होता है जिसमें कोई त्यौहार न आता हो।बहु- जातियों और बहु-भाषी होने के बावजूद भी यहां लोग मिल-जुल कर रहते है और यही इस देश की सबसे बड़ी विशेषता है।
उत्तराखंड की बात की जाय तो यह इस भू-खण्ड के 9 जिले पहाड़ी क्षेत्र में आते है । जो मूल रूप से उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना थी।बाद में राज्य गठन के समय मैदानी जिलों को इसमें सामिल किया गया।
अपनी अलग सांस्कृतिक पहिचान के लिए विश्व प्रसिद्ध उत्तराखंड राज्य गठन के बाद सुख सुविधाओं (बेहतर शिक्षा,स्वास्थ्य,रोजगार)के लिए तेजी से पलायन होने लगा और साथ ही पलायन होने लगी हमारी संस्कृति,रीति रिवाजों का भी ।
मैं बात करना चाह रहा हूँ करवा चौथ के ब्रत की आज से लगभग 15 साल पहले इस ब्रत को गढ़वाल कुमाऊँ में सिर्फ मैंदानी क्षेत्र के लोग और मूल रूप से पंजाबी समुदाय के लोग ही मनाया करते थे।लेकिन आज के समय में गढ़वाल कुमाऊँ में लगभग 90 प्रतिशत से अधिक लोग इस त्यौहार को मनाते है ।इनमें से अधिकतर लोगों को अपने मूल त्योहारों के बारे में पता तक नही होता है।
किताबी कथाओं के अनुसार इस ब्रत को रखने वाली सुहागिनों के पत्तियों की उम्र बडती है। लेकिनआज के 5Gके जमाने मे यह व्रत कितना प्रासंगिक होगा यह कहना बहुत मुश्किल है। मेरा विरोध करवा चौथ का त्यौहार नहीं है। बल्कि उत्तराखंडी पहाड़ी मूल के लोगों को अपने परम्परागत रीति रिवाजों को भी उसी संजीगदी के साथ याद रखने और मनाने की है जितना कि दूसरे समुदायों के त्योहारों की । तभी हमारी पहचान बरकरार रह पायेगी वरना कहीं ऐसा न हो कि आने वाली पीढ़ी यह ढूँढने लग जाया कि हम कौन थे??

-भानु प्रकाश नेगी।