चार धाम यात्रा मार्ग पर कट रहे पीपल के पेड़ों पर “मैती” जी जताई गम्भीर चिन्ता।

देवप्रयाग से श्री बद्रीनाथ की ओर चलने पर सड़क के किनारे पीपल के पेड़ हर सौ मीटर की दूरी पर हरे भरे दिखाई देते हैं लेकिन देवप्रयाग से मुनि की रेती तक पीपल के पेड़ नहीं है। चार धाम यात्रा पर जब लोग पैदल चलते थे तो अपने पितरों के नाम पर देव भूमि में एक पेड़ जरूर लगाते थे। आज उनके लगाये पेड़ विस्तृत आकर ले चुके हैं। अक्सर पानी के स्थान पर पीपल का पेड़ जरूर होगा। ऐसे ही दो विशाल पेड़ गौचर से आगे चटवापिपल के समीप गधेरे में स्थित थे यात्रा की कई गाड़ियाँ यंहा पर रूकती थी,यात्री लोग पानी में नहाते थे और पीपल के पेड़ के नीचे विश्राम करते थे। उन्हें आपार शांति मिलती थी।


आल वेदर रोड के निर्माण में आजकल सारे पीपल के पेड़ कट चुके हैं। या कट जायेंगे। 35 हजार से 1 लाख तक पेड़ कटेंगे। सबसे बड़ा सवाल है कि जिन पेड़ों को हमारे पुर्वजो ने हजारों साल पहले लगाये थे क्या उनकी भरपाई हो पायेगी। आल वेदर रोड भी पहाड़ के विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है,लेकिन क्या इतने पेड़ो के लिए सरकार ने कोई विकल्प खोजा है? क्या ईमानदारी और पारदर्शिता से पेड़ लग पायेंगे,? क्या इन पेड़ों की भरपाई उत्तराखंड की भूमि में होगी या राज्य से बाहर? क्या जनसहभागिता से पेड़ लगाने का कार्य होगा या केवल खानापूर्ति? हिमालय और गंगा केअस्तित्व का गंभीर सवाल है। देव भूमि और यहाँ के लोगों की आस्था का सवाल है? जबाब जरूर चाहिए। वृक्षारोपण में लापरवाही बर्दास्त नहीं होगी। यह भी सच है कि पहाड़ के लोग पत्थरों पर भी जंगल खड़े करने की हिम्मत रखते हैं।

-कल्याण सिंह रावत “मैती” जी की fb वाॅल से।