नई खोजः चमोली के कंडारा गांव के पास मिला दुर्लभ फर्न ट्री ।

 

भानु प्रकाश नेगी

देहरादून:लीविंग जीवाश्म फर्न जुरेसिक काल जब धरती पर भीमकाय प्राणी डायनासौर पाये जाते थें में बहुत मात्रा में होते थे तब इन पेड़ों की उंचाई लगभग पचास से सत्तर फीट तक होती थी।इन फर्न के पेड़ो को उस समय के प्राणी अपना भोजन बनाते थे।इन लीवींग फर्न को स्थानीय लोकभाशा में लिगुडा भी कहा जाता है। हॉल ही में फर्न के एक पेड़ का पता चमोली जिले के बद्रीनाथ राश्ट्रीय राजमार्ग पर पडने वाला सुनाला गांव से दस किलोमीटर की दूरी की कंडारा गांव में काली माता मंदिर के पास स्थित है।

जुरेसिक काल में पाये जाने फर्न ट्री अब विलुप्त प्रजातियां में से एक है। हाल ही में बद्रीनाथ हाईवे से 10 किलामीटर की दूरी पर स्थित कांडरा गांव के कालीमाता मंदिर के पास एक फर्न ट्री को पाया गया है। जिसकी उचाई 12 से 13 फीट है। लगभग दो से ढाई फीट व्यास का यह वृक्ष सदियों पुराने होने कारण इसे स्थानीय लोग देवता के रूप् में पूजतें है।इस पेड़ की पहिचान करने वाले प्रसिद्व पर्यावरण विद् कल्याण सिंह  रावत मैती का    कहना है कि इस एतिहासिक फर्न ट्री को संरक्षिक करने की आवश्यकता है। पर्यटन की दृष्टि से यह हमारी आय का साधन बन सकता है।

फर्न विषेशज्ञों भूपेन्द्र खोलिया का कहना है कि इसका तना सौलट्री होता है।एक बार कटने पर इसमें कली नही निकलती है।इसलिए यह जल्दी खत्म हो जाता है। इसको संरक्षित करने के लिए मात्र एक ही तरीका है कि यह जहां भी होता है इसके एक किलोमीटर स्थल पर पांच साल के लिए संरक्षित करना होता है।

जुरेसिक काल में भीमकाय डायनासौर का भोजन फर्न ट्री अब विलुप्त प्रजातियों में से एक है। जिनकी संख्या बहुत कम रह गई है।हॉल ही में पाये गये इस फर्न ट्री भी इनमें से एक है। सरकारों के द्वारा अगर इसका जल्द संरक्षण नहीं किया गया तो हम एक एतिहासिक धरोहर को खो देगें।