जल संकट के लिए कितने तैयार है हम।

जल ही जीवन है,यह नारा सुनने में बहुत अच्छा लगता है,लेकिन क्या हम दिन प्रतिदिन होने वाली जल की समस्या के लिए सामुहिक रूप से प्रयास कर रहे है?या सिर्फ सरकारों के भरोसे बैठे हुऐ 22 मार्च को मनाये जाने वाले विश्व जल दिवस का उद्देश्य विश्व के समस्त विकसित देशों में स्वच्छ एवं सुरक्षित जल उपलब्ध करना है। स्वच्छ जल प्राप्त करना सभी का अधिकार है लेकिन क्या यह हमें मिल सही मायने में मिल पा रहा है.

पृथ्वी में 71 प्रतिसत भाग जल से घिरा हुआ है,जबकि 29 प्रतिसत भाग पर स्थल है…पृथ्वी पर सिर्फ तीन प्रतिसत पानी पीने योग्य है। और उसमें से भी 2.4 प्रतिसत हिस्सा गिलेशियर,दक्षिणी धु्र्रव पर जमा है,व .6 प्रतिसत नदी तालाबों,झीलांे व कुआं में मौजूद है। बात अगर हिम से आछादित उत्तराखंड के परिपेक्ष में करंे तो यहां पर भू-जल संरक्षण न होने से ढ़लानों के रास्ते जल बह जाता है,जिससे भू जल संरक्षण नही हो पता है। आये दिन प्राकृतिक स्रोत सूखते जा रहे है,जो आने वाले समय के लिए खतरा है। प्रसि़द्व पर्यावरणविद्व कल्याण सिंह मैती का कहना है कि जल संरक्षण के लिए पहाडों में बांज के पेडों का होना अति आवश्यक है जो लगातार खत्म हो रहे है,इनकी जगह तेजी से चीड़ का जंगल ले रहा है जो जल के प्राकृतिक स्रोतों को खतरनाक स्थिति में पंहुचा रहा है।बांज का एक स्वस्थ पेंड़ 48 घंटे में 400 गैंलेन पानी को जमीन की सतह पर डाल देता है।

– उत्तराखंड में अपार जल संपदा होने पर भी यहां का जल यहां के काम नही आ पाता है।जिसका मुख्य कारण यहां पर जल संरक्षण का उचित प्रबंधन नही होना है…गंगा जमुना के मुल्क होने के बाद भी यहां के कई गांवों में गर्मी के मौसम में पीने के पानी के लिए टैंकर से पानी सप्लाई करना पडता है।तो शहरों में कई स्थानों पर कई दिनों तक पीने के पानी के लिए लोगों को तरसना पडता है।भू बैज्ञानिक प्रो.एम.पी.एस बिष्ट का बताते कि पर्वतीय भागों पर तेज ढ़लान के कारण पानी सीधे बह जाता है। इसे जमीन की सतह पर डालने के लिए हमें छोटे छोटे चैकडेम व वाटर पूल बनानें की आवश्यकता है जिससे जमीन में पानी की मात्रा बराबर स्तर पर बनी रहे और प्राकृतिक स्रोतों में पानी बना रहे।

विश्व जल दिवस पर गोष्टी व सेमिनार कर जल संरक्षण की बातें तो की जाती है,लेकिन इसे बचाने का धरातल पर कम ही प्रयास दिखता है।बात अगर उत्तराखंड की जाय तो उचित जल प्रबंधन न होने के कारण यहां कई गांव जन शून्य हो गये है और यह सिलसिला बदस्तूर जारी है।जल संरक्षण न सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी है,बल्कि जब तक विश्व का प्रत्येक नागरिक इसकी निजी जिम्मेदारी नहीं लेता तब तक यह सपना साकार नही हो सकता है।
– भानु प्रकाश नेगी , देहरादून।