ऐसा क्यों कहा जंगली ने – चेत जाओ आज जो है वो 10 या 15 साल बाद नही रहने वाला है तुम्हें बचाने वाला कोई नही ?

                                                                // भानु प्रकाश नेगी//

पलायन आयोग बनाने से नही रूकेगा पहाडों का पलायन-जगत सिंह जंगली

आपकी पृष्ठभूमि क्या है?
1973-74 के दसक में मै सीमा सुरक्षा बल में था एक बार में छट्टी आया तो मैने देखा कि गांव की महिलायें दूर दराज की दुर्गम पहाडियों में घास और लकडी के लिए जा रही है। और कई बार इनके साथ हादसे हो जाते थें तब मैने सोचा कि चारे और लकडी की ही तो बात है तब मैने ठान लिए कि में अपने खाली पडी बंजर जगह में पेड़ लगाउगा तब पर्यावरण को बचाने वाली कोई बात नही थी। और इन पेड़ के बचाव के लिए रामबाण से धेरबाड शुरू कर दी ।यह काम मै अपनी छटटीयों के दौरान लगातार करता रहा।
-जगत सिंह चौधरी से जगत सिंह जंगली कैसे हुये?
1980 में सेवानिवृति के बाद मैने पूर्णरूप से में इस कार्य में लग गया इस काम में गांव वालों ने भी मेंरा साथ दिया पहले पानी नही था तो दूर से पेड़ के लिए पानी ला कर इन्हें सींचा करता था।ं पेड़ धीरे धीरे बडे़ होने लगे और मेंरा साहस बढता गया और देखते ही देखते यह मिश्रित वन बन गया।ं इस साल बाद जब पेड काफी बडे हो गये तब मेरे दिमाग में एक बात और आयी कि जंगल तो तैयार हो गया लिंकन आजीविका का क्या होगा । तब मैने इन पेड़ों के नीचे हल्दी,अदरक,अरबी,बडी इलायची,और जड़ी बूटियों उगाना शुरूकर दिया। जब वह विशाल मिश्रित बन बन गया तब 1993 में लोगों को बताना शुरू किया तब इलाके के लोगों ने एक मीटिंग में मुझे जंगली की उपाधि दी। यह खबर अखबारों में छपने के बाद तत्कालीन प्रमुख आर आर टोलिया मेरे जंगल को देखने आये तब उन्होनें एक पत्र जारी कर बताया कि इसी तरह के जंगल हिमालय में विकसित करने की आवश्यकता है। तब यह सिलसिला जारी हो गया और तब मैने मिश्रित वनों को बडावा देने की बात शुरू कर दी । दिल्ली में एक सेमिनार मेरा प्रजेन्टेसन हुआ और उसके बाद मुझे नेशनल आवार्ड भी मिला । फिर फैरेस्ट विभाग ने भी मिश्रित वन बनाने शुरू कर दिये । तत्कालीन राज्यपाल मेरे जंगल देखने आये 2002 में मुझे साइंस कार आर्वाड मिला।

– मिश्रित वन बनने के बाद जलवायु परिवर्तन का हल आपने कैसे किया?यह आडिया आपके पास कैसे आया?

यह सब करने के बाद मैने शुक्ष्म जलवायु परिवर्तन करना मैने शुरू कर दिया जिसमें स्टोन, बुड टैक्नालैजी आदि विकसित करना शुरू कर दिया । जिससे वहां की जलवायु परिवर्तन होने लगी। यह सब आईडिया काम करते करते आया। क्योकि मेरा बेटे भी मेरे साथ ही काम करता है जो पर्यावरण साइंर्स स्नाकोतर कर रहा है उसके सहयोग से में यह सब कर रहा हू। आज वहां की जलवायु बदल गई है। आज 40 साल बाद जंगल की जड़ में पानी का स्रोत फूट गया है। जीरो बजट से शुरू किया गया यह बन आज 1000 से अघिक मिश्रित पेडों का जंगल बन गया है।25 की हरी घास 60 प्रकार की प्रजाति के बन है,25 प्रकार की जड़ी बूटियां है।कैस क्राप है। आज उस जंगल में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र,गढवाल विश्वविद्यालय के बच्चे, आष्ट्रेलिया सिडिनी के बच्च,े अमेरिका से,इंग्लैण्ड से रिर्सच के लिए आते है। इग्लैण्ड की रेमडी ने हमारे मिश्रित बनों का भ्रमण करने के बाद यूएनओं में प्रस्ताव डाला कि जंगली जी के जंगल की तर्ज में विश्व में ग्रीन फारेस्ट के रूमे पूरे विश्व में फैलाना चाहते है।
– वनों को विकसित करने के बाद इन से आजिविका के बारे में आपने कब सोचा?

1997 में मेरे दिमाग में यह बात आयी कि जंगल तो विकसित हो गये है। पेड़ तो लग गये है लेकिन हम इन्हें काटते तो नही है फिर तो यह हमारी आजीविका तो हो ही नही सकते है। तो उसके अवज में जो ये हमें आक्सीजन दे रहे है उसका पैसा हमें मिलना चाहिए। तब मैन गांव के 30 लोगों को लेकर पैदल यात्रा की दिल्ली राजधाट तक तत्कालीन प्रधानमंत्री आई के गुजराल और राष्ट्रपति केआर नारायणन को मिले तत्कालीन शिक्षा पर्यावरण मंत्री को मिलने पर उन्हे प्रस्ताव दिया कि हिमालयी क्षेत्र में बनों से उत्पादित आक्सीजन में वहां के लोगों को रायलटी मिलनी चाहिए पहले तो वह भौच्चके रह गये कि आक्सीजन की रायल्टी क्या होती है? दो तीन महीन तक बहस के बाद भी मुझे उस पर किसी ने तवज्जू नही दी। लेकिन यही मुददा जब जापान की संसद में उठा तब पूरे विश्व के कान खडे हो गये तब जाकर कार्वन केडिट की वात होने लगी और 2007 में जो कमेटी बनी थी उसने रिर्पोट दी ओर तब हमारी बात को मान लिया गया। और हम 30 आदिमियों को तत्कालीन विश्वद्यालय के कुलपति एस पी सिंह हमको सम्मानित करने हमारे गांव आये।
– अब आपका फोकस पर्यावरण की किस दिशा में है?
आज मेरा फोकस हिमालय बचाओं की दिसा में मेंरा मनाना है कि सिर्फ बडी बडी बाते भाषण, सेमिनार, गोष्ठियों कर र्प्यावरण नही और हिमालय नही बचाया जा सकता है। हमें जमीन पर काम करने की जरूरत है। तभी कुछ हो पायेगा।

 -आपकी यह सोच कि ग्रामीण महिलाओं को दूर चारे और लकडी के लिए नही जाना पडेगा कितना साकार हो पाया है क्या महिलाओं को आपके जंगल से चारा लकडी मिल पा रहा है?

मेरे जंगल विकसित करने का असर यह हुआ कि अब गांव में महिलाओं ने खुद ही चारे के लिए पेड विकसित कर लिए है? पहले ये लोग पंछियों के फसल को नुकसान उठाने के डर से पेड़ नही पाला करते थे। लेकिन जब मैने लोगों को समझाया कि थोडे से नुकसान के लिए आप अपने शरीर का इतना बडा नुकसान क्यों कर रहे हो तो तब ग्रामीणों ने खेतों में चारे के पेड़ उगाने शुरू किया और उसका असर यह है कि लोगों ने चारे के लिए जंगल जान ही बंद कर दिया है।

 -अकसर देखा जाता है कि देहरादून या दिल्ली के एसी कमरों में र्प्यावरण और हिमालय बचाने के नाम पर बडी गोष्ठियो और सम्मेलन किये जाते है लेकिन नतीजा शून्य होता है? क्या किये जाने की आवश्यकता है।
दरअसल हमारी स्टेडिज ही लकीर के फकीर की तरह हो गई है। हिमालय बातें करने से गोष्टी करने से नही बच सकता है हिमालय को बचाने के लिए हिमालय जैसा बनना पढेगा आपको धरती पर उतरना पढेगा जैवविविधता को बड़ाना होगा ताकि हमारे हिमालय के ग्लिसियर ठीक रह सके , ट्री लाईल को बडाना होगा। ताकि हमारा पानी सतत रह,े कृषि सतत रहे हमारे बन्य प्राणी सतत रहें। आज तक हुआ यह है कि हम अच्छे अच्छे भाषण देते रहे गोष्टी और सम्मेलन करते रहे और इधर हमारी कृषि चौपट हो गई, पलायन बदस्तूर जारी है। और सबसे बड़ी बात यह है र्प्यावरण पर बडे बडे भाषण देने और पुरूषकार लेने वालों से आज तक किसी ने यह नही पूछा कि तुमने आजतक किया क्या है।
– ऑल वेदर रोड़ को पर्यावरण की दृष्टि से कितना संवेदन सील मानते है आप?
मेरा स्पष्ट मानना है कि र्प्यावरण और विकास को हमे साथ साथ लेकर चलना होगा। लेकिन अभी तक तो एक तरफा बात हुई है ऑल वेदर रोड़ की बात तो तो गई है लेकिन र्प्यावरण को इससे कितना नुकसान होगा इसके लिए क्या नीति होगी यह स्पष्ट नही हो पाया है ऑल वेदर रोड अगर विकास की बात है तो पर्यावरण के नुकसान की बात क्यो नही हो रही है।
पेड को काटने की जगह रिप्लाट की बात होनी चाहिए। तभी हिमालय बच सकता है।
– उत्तराखंड में अपने आप को बडा पर्यावरणविद अपने आप को कहलाने वालों के पास अपना कोई रोड़ मॉडल भी नही है फिर भी वो पद्मश्री और रमन मैग्सिसे जैसे पुरूषकार ले गये है आपका क्या कहना है?
देखो सब जानते है कि हकीकत क्या है सब जानते है मै ज्यादा तो नही कहता पर यह सब गलत बात है कम से कम उत्तराखं डमें तो इस तरह लागो को इस तरह के काम नही करने चाहिऐ । जहां तक मेरी बात है मेरा फोकस अपने काम की ओर है कौन क्या कर रहा है मुझे फर्क नही पढता है मै अपनी युवा पीड़ी को कुछ नया दे पाउ ये मेरे लिए बडा काम होगा।
– उत्तराखं डमें बने बांधों का ज्यादा फायदा प्रदेश को नही मिल पाया है और अभी भी लगभग 500 से अधिक प्रास्तावित छोटे बडे बांध है क्या किये जाने की आवश्यकता है?

मैने शुरू से आज तक एक ही बात कही है कि बांध भी आज की आवश्यकता है लेकिन उसका स्वरूप् क्या होगा इस पर विचार किये जाने की आवश्कता है। छोटे छोटे बांध हो जिससे हमारी जैव विविधता ज्यादा प्रभावित न हो । जन सुनवाई होना सबसे आवश्यक है बांध से प्रभावित लागों की 10 बी वार जन सुनवाई हो उनकी इच्छा जाननी जरूरी है । टिहरी बाधं का दंश आज भी प्रतापनगर वालों को झेलना पढ रहा है ऐसा नही होना चाहिए कि किसी को उजाला मिले और किसी को अधेंरा। इसका सबसे ज्यादा फायदा बांध प्रभावितों को मिलना चाहिए।
– पर्यावरण को रोजगार से कैसे जोडा जा सकता है?
मैने पलायन को लौटाया है जो पलायन करके गये है आज जो मॉडल जंगलों का बनाया है उसको देखने के लिए न सिर्फ देश के लोग बल्कि विदेशों से भी लोग आ रहे है।ऐसे मॉडल उत्तराखं डमें हर जगह डबल्प होने चाहिए तो लोग अपने घरों के लिए लौटेगें। खेती को एक सम्मानजनक पेसा बनाना होगा। मेंरा मानना है कि आने वाले समय में शहरों मे लोगों को शुद्व हवा की आवश्यकता पढने वाली है इतना ज्यादा कार्वन शहरों में बड़ रहा है। शहरों के लोग शुद्व हवा पानी भोजन ढूडेगे। इसके लिएं हमें इको विलेज बनाने होगें जो हमारे युवाओं को रोजगार के स्वार्णिम अवसर प्रदान करेंगें।क्योकि लोगों की सांस अटक रही है उन्हे बचाने की जिम्मेदारी भी हमारी है।
ऽ वन विभाग और स्यंमसेवी संस्थाओं के द्वारा हर साल हजारों पेड रोप दिये जाते है लेकिन इन में से कोई भी पेड अगले साल तक नही बचता है आपका क्या मनाना है?
ऽ दुभार्ग्य से यह एक फैसन सा हो गया है कि पेड़ लगाओं और फोटो खीचकर अखबारों में छप जाओं उसके बाद उससे पूछने वाला कोई नही होता है। उसके एवुलेसन की बात कभी नही होती है कि वन विभाग द्वारा कभी भी यह जाना नही जाता कि कितने पेड़ बच गये है जब तक चेक एण्ड बैलेन्स की बात नही होगी तब तक कुछ भी नही होने वाला है।
– वर्तमान सरकार की पलायन नीति सफल होगी या नही?
यह तब तक सफल नही होगी जब तक पलायन को एक सम्मानजनक पेसा नही बनाया जायेगा क्योकि एक नीति पहले ही फेल हो चुकी है बीरचन्द्र सिंह गढवाली वाली। हमें गांवों में स्वरोजगार से जोड़ना होगा।जंगल बनाने वाले जंगल बनाये, खेती करने वाला ऑरगेनिक खेती करे, पानी बचाने वाला पानी बचाये ंतब लोग हमारे पास आयेगें और हमारा युवा रोजगार पायेगा।
– युवाओं के क्या संदेश देना चाहते है ?

चेत जाओ आज जो है वो 10 या 15 साल बाद नही रहने वाला है तुम्हें बचाने वाला कोई नही तुम्हें खुद करना होगा अपना बचाव। आपको अभी से अपने जल जंगल जमीन के लिए अभी से आज से ही काम करना होगा।