इस औषधीय पौध में है दांतों की सम्पूर्ण सुरक्षा।

उत्तराखण्ड का बहुमूल्य उत्पाद

तिमरू / Zanthoxylum

2उत्तराखण्ड अपनी अलौकिक सुंदरता के साथ-साथ हमें विभिन्न अमूल्य सम्पदा से भी भरपूर रखता है, इन्ही अमूल्य सम्पदाओं में से एक तिमरू भी हमारे आसपास स्वतः ही उगने वाला बहुमूल्य पौधा है। जब विश्व में दन्त चिकित्सा जैसी विद्या का अस्तित्व होगा भी नहीं तब से हमारे पूर्वजों द्वारा तिमरू के तने को दांतून के रूप में प्रयोग किया जाता था तथा इसके प्रयोग से दांतों को स्वस्थ तथा सुरक्षित रखा जाता था। धीरे-धीरे अत्याधुनिक युग में विज्ञान की बढ़ती खोज तथा पहुंच के बीच तिमरू का अस्तित्व मिटने ही लगा था कि पुनः वैज्ञानिक शोध तथा विश्लेषणों के आधार पर तिमरू को एक नया स्थान प्राप्त हुआ तथा नये रूप में आज हमारे बीच विभिन्न नामों से अलग-अलग उत्पादों के रूप में बहुतायत में उपलब्ध है।

Rutacea कुल के Zanthoxylum जीनस के अर्न्तगत पूरे विश्व में इसकी लगभग 250 प्रजातियां पायी जाती है, जिसमें से कुल 12 प्रजातियां भारत में पायी जाती है। उत्तराखण्ड में मुख्य रूप से पाये जाने वाली 04 प्रजातियां Z. armatum DC., Z. acanthopodium DC., Z. oxyphyllum Edgew and Z. budrunga पायी जाती है। यह भारत के अलावा नेपाल, भूटान तथा चीन में पाया जाता है। समुद्र तल से 1000 से 2100 मीटर तक की ऊॅचाई पर पाया जाने वाला यह बहुमूल्य पौधा उत्तराखण्ड के अलावा उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, मेघालय, मिजोरम तथ मणिपुर आदि में भी पाया जाता है। इसको सामान्यतः Timur तथा संकृत में तेजोवटी नाम से जाना है। उत्तराखण्ड के कुमांऊ क्षेत्र में इसे तिमूर एवं गढवाल क्षेत्र में टिमरू नाम से जाना जाता है।

परम्परागत रूप से तिमरू का उपयोग दांतून के अलावा मसालों तथा अन्य विभिन्न औषधीय रूपों में भी किया जाता है। भारत तथा चीन में इसे सांप काटने पर उपचार हेतु भी प्रयोग किया जाता है। तिमरू को औषधी के अलावा larvicidal तथा insecticidal में भी प्रभावी पाया गया है। तिमरू में विभिन्न पादप रसायन पाये जाते है जो कि विभिन्न औषधीय रूपों में प्रभावी होते है। इमसें बरबेरिन, अरमाटामाइड, लिमोनिन, लीनालूल, टाम्बुलिन तथा जेन्थोनाइट्राइल आदि मुख्य रसायनिक अव्यव भी पाये जाते है। विभिन्न रसायनिक अव्यवों के साथ-साथ तिमरू में विभिन्न प्राकृतिक तत्व भी पाये जाते है जैसे मैंगनीज-5.63, जिंक-89.6, कॉपर-31.6, आयरन-25.0, सोडियम-140.6 तथा पोटेशियम-5.70 ppm तक पाये जाते है।

उत्तराखण्ड में तिमरू को 45 रूपये/किलो तक स्थानीय बाजारों में बेचा जाता है, जबकि मैदानी इलाको में इसकी कीमत 150-200 रूपये/किलो तक रहती है। उत्तराखण्ड के मुनस्यारी तथा धारचूला में तिमरू को स्थानीय लोगों द्वारा अपने आर्थिकी से जोडा गया है जो कि विभिन्न औषधीय तथा कोस्मेटिक जैसे उद्योगों को कच्चे माल के रूप में तिमरू उपलब्ध कराते है।

हमारे प्रदेश में तिमरू के प्राकृतिक उत्पादन तथा विभिन्न शोध पत्रों में प्रकाशित इसके cytotoxic, anti-oxidant, hepatoprotective, anti-bacterial, anti-diabetic, anti-inflammatory तथा analgesic आदि प्रभावों को देखते हुए इसके विस्तृत अध्ययन किया जाना चाहिए। प्रदेश में स्थापित विभिन्न उद्योगों हेतु तिमरू को कच्चे माल के रूप में स्थानीय बाजारों से पूर्ति कर प्रदेश की आर्थिकी से सीधे जोड़ा जा सकता है।

डा0 राजेन्द्र डोभाल
महानिदेशक
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद
उत्तराखण्ड।