हेम्प (भांग) की खेती नशा नही रोजगार का बनेगी जरिया। जाने इस खास लेख में।

हेम्प की खेती से नसा नही रोजगार मिलेगा

– हेम्प की खेती से होगी उत्तराखंड में रोजगार का श्रृजन।
– किसानों और युवाओं को मिलेगा रोजगार,पलायन पर लगेगी रोक।
– बंजर खेतों को मिलेगा नया जीवन,उगलेंगे सोना।

-भानु प्रकाश नेगी

उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों से रोजगार की तलास में पलायन जारी है। जिससे न सिर्फ सांस्कृतिक विरासतों व संस्कृति को नुकसान हो रहा है। बल्कि देश के सामरिक दृष्टि से अति संवेदनशील माने जाने वाले सीमान्त जिलों को खतरा पैदा हो रहा है। बेहतर सुख सुविधाओं और रोजगार की तलास में गांवों से शहर की ओर हो रहे पलायन अभी सरकारों के लिए सबसे ज्यादा चिन्ता का विषय रहा है। भले ही गांवों में पहले से ज्यादा सुख सुविधाायें हो गयी है। लेकिन पर्वतीय जिलों मंे शिक्षा,स्वास्थ्य,रोजगार की सुविधाओं के बदहाल होने के कारण यहां के लोंगों को बडे शहरों की ओर रूख करना पढ रहा है।
वर्तमान सरकार द्वारा हेम्प एसोसिएसन के साथ हेम्प की खेती का अनुबंध काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि यह अनुबंध सफल रहा तो सरकार की इसे बडी उपलब्धियां में सुमार किया जायेगा। अनुबंध के अनुसार हेम्प एसोशिएसन पहाडों में किसानों और पलायन कर चुके लोंगों की बंजर भूमि को किराये में लेकर या किसानों को प्रशिक्षित कर हेम्प की खेती करवायेगी साथ ही स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग प्लांट लगाकर लोगों को रोजगार देगी। उसका विपणन हेम्प एसोसिएसन के द्वारा किया जायेगा। जिससे न सिर्फ पहाडों में पलायन रूकेगा बल्कि सामरिक दृष्टि से भी देश को मजबूती मिलेगी।
हाॅल ही में हेम्प की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु का सर्वे कर दून पंहुची हेम्प एसोसिएसन की टीम ने हिमवंत प्रदेश न्युज डाॅट काॅम से खास बातचीत में बताया कि हमने यहां मिटटी का परीक्षण करना शुरू कर दिया है क्योकि हेम्प मंे नाईट्रोजन की ज्यादा आवश्यकता होती है यहां की मिट्टी मंे नाईट्रोजन की मात्रा कितनी है, साल में कितनी खाद डालनी चाहिए, ज्यादा खाद मंहगी पड सकती है इसे कैसे काटना है क्योकि इससे रेशा,बीज,फूल,सभी चीजें अलग अलग निकालनी है। इसकी टैक्नीकल टेªनिंग का सेमिनार भी रखा जायेगा। गांवों में अपनी यूनिट लगा कर सिखायेगें मीडिया,सोशल मीडिया आदि पर प्रचारित प्रसारित किया जायेगा। अभी हेम्प की खेती को उत्तराखंड में पायलेट प्रोजेक्ट के तौर पर चलाया जा रहा है। फिलहाल बीज के लिए इसे उगाया जा रहा है।
रेबन्यु के तौर पर इसे उत्तराखंड को कितना फायदा हो सकता है। 2019 तक रोजगार,पलायन आदि के लिए कितना फायदेमंद यह होने वाला है?
यह 1 लाख हैक्टेयर तक का प्रोजेक्ट है।इसके सिर्फ रेशे का उत्पादन फाईबर सेन्ट्रल बोर्ड मीनिस्ट्रीयल ने 280 यूएस डाॅलर इंडिया को कन्जव करने का टारगेट है।क्योंकि इसकी रेगूलर सप्लाई नही है इसलिए कोई कार्मशियल यूनिट हाथ नही लगाती है। जंब यहां से एक डाटा जायेगा कि यहां लाखों टन में हेम्प का उत्पादन होने लगा है।तब कामर्शियल इण्डस्ट्रीज अपने आप इसे पिक कर लगी। इससे कम से कम तीन फेजों में किया जायेगा । जिसमें प्रथम चरण में एग्रीकल्चरल एरिया एक्सपाट है।इसमें सीड ब्रिडिंग के साथ साथ रेसा,तना,जड़,फूल, पर काम होगा। और इण्डट्री को डब्लप किया जायेगा।
दूसरे चरण में इसके रेशा को गांव गांव में लोगों में पंहुचाया जायेगा साथ ही उनको टेªनिंग भी दी जायेगी पायलट प्लान बनाये जायेगों लोगों को एजूकेट किया जायेगा। की जिससे इसके बहु उत्पाद बनाये जा सके और इंडिया में मार्केट बनायी जायेगी। विदेशों में हेम्प की पहले से ही मार्केट है।तीसरे चरण में माकेटिंग,एग्रीकल्चर आदि का सेटअप बनाया जायेगा।हमारी कोशिस रहेगी कि इसे कर पायेगंे। और जनता ने साथ दिया तो हम एक वर्ड रिकार्ड भी बनायेगें।
क्या उत्तराखंड की धरती हेम्प की खेती के लिए उपयुक्त है।
अगर हम इसके जीन में जायेगें तो उसमें पायेगें कि यह सबसे पहले चीन और भारत में पाया गया तब यह विश्व के अनेक देशों कनाडा,युरोप,यूके्रन आदि जगह गया। जो बीज हम यहां पायलेट प्रोजक्ट के तौर पर उगा रहे है।उसकी जडे़ं ज्यादा बडी नही होती है।यहां की मिट्टी हेम्प के बीज के लिए उपयुक्त है।पहाडों में लोगों को इसे उगाने का काफी एक्सपीरेन्स है।अगर अलग राज्यों में इसे उगाने की बात की जाय तो वहां पर हमें शुरू से ही ट्रेनिग देनी पढेगी लेकिन यहां लोग हमें ट्रेनिंग देने को तैयार है।हमें डेटा कलेक्टर पैरामीटर सलेक्ट करेंगें यह पायलेट प्रोजेक्ट डेटा का ही होगा हमारा लक्ष्य 2019 तक 250करोड तक है 5 साल में हम 1000 करोड़ तक हम टच कर पायेगें।
हेम्प की खेती के क्या क्या फायदे है यह किस तरह से किसानों के लिए उपयोगी सि़द्व हो सकती हैै?
इस पौधे का हर भाग अतयन्त महत्वपूर्ण और उपयोगी है।इसकी जड़ मंे नाईट्रोजन की मात्रा काफी हाई पावर में होती है।इसकी खेती करने का यह भी फायदा है कि इसकी फसल काटने के बाद अन्य फसलों की पैदावार बहुत अच्छी होती है।.विश्व के कई देशों इसकी जड़ों की काफी डिमांड है।यूके्रन इथोपिया में भूमि को ऊपजाऊ बनाने के लिए हेम्प की जडों को मंगाया जाता है।इसके तने से इण्डस्ट्रीयल मैटिरीयल बनाया जाता है।प्लाईबोर्ड बनाया जाता है।जो अतियंत उपयोगी होता है। हमने पुणें में पराज लिमिटेड के साथ बायोएथेनोल टेस्ट करवाया जिसमें हमनें पाया कि इस प्रोडक्सन गेंहू,चावल,गन्ना से भी ज्यादा पाया गया। इसके एक टन में 380 लीटर की आउटपुट पायी गई। हमारा भविष्य में यह भी योजना है जीरों वेस्ट टेक्नालोजी की जायेगी क्योंिक इसमें बायोमाॅस बहुत मात्रा में निकलने वाला है।यह प्रोजक्ट लगभग 750 करोड़ रूपये का होगा।इसके रेशे से फाईबर की जीन्स, कपडे, कारपेट बनाये जाते है। जिनकी बहुत ज्यादा डिमांड अन्र्तराष्ट्रीय बाजार मैं है।
यह सीड ब्रीडिग प्रोजेक्ट है जिसमें हमने कुछ डाटा जुटाया है यह विशेष प्रकार की प्रजाति है जो विश्व के कई देशों में खेती के तौर पर की जाती है।इसे इण्डस्ट्रीयल हेम्प कहते है। इस प्रोजक्ट में सबसे पहले फरवरी माह में मिटटी का परीक्षण किया जायेगा। 50टन के लगभग बीज को बोया जायेगा।इसके बाद ग्रामीणों को प्रशिक्षण दिया जायेगा।2019 तक हमारा लक्ष्य 1000 एकड में इसे उगाने का है।
उत्तराखंड को आने वाले दिनों में कितना फायदा होने वाला है।क्योंकि यहां पलायन एक बडी समस्या के तौर पर जन्म ले रही है?
हमारे अभी तक के सर्वे में यह पाया गया है कि यहां अभी तक जो लोग इसे उगाते है।उसका उनको कार्मशियल फायदा नही मिलता है।हमारी एसोशिएसन हेम्प के मार्किटिग सेल्स पर ही एराउण्ड किया है।हमारा पहले से ही कन्सेप्ट है। जो उत्तराखं डमें उगेगा उस पर सप्लाई एवं माकेटिंग का रहेगा हम अभी से प्लान कर रहे है कि एक बडे एरिया में इसका बेयर हाउस बनायेगें। अगर किसान हेम्प की खेती करते है तो उसे बेचने की हम पहले से ही सुविधा कर देगें।इसके रेशे का अंतराष्ट्रीय माकेट में अत्याधिक डिमांड है, जो पूर्ति नही हो पा रही है इसके फूल से आयुबेदिक दवायें बनायी जाती है। यह लो टीएफसी का हेम्प होगा इसके रेशे से लेडिज,जेन्टस के कई प्रकार के परिधान एवं जूते, चटाई, कारपेट,आदि बनायी जाती है।हम यहां पर एक प्रोसेसिंग यूनिट बनायेगें जिसमें लोग समूह के साथ काम करेगें।
आपकी टेक्नीकल टीम पहाडों में कैसे काम करेगी?
यहां के लोगों को हेम्प की खेती कैसे करनी है यह तो पता है लेकिन टेक्नीकल तरीके से कैसे करते है यह पता नही है। हमारी टैक्नीकल टीम एक सामूहिक सेमिनार के जरिया लोगो को टेªनिंग दी जायेगी। समित्तियों के द्वारा बीज दिया जायेगा तब उन्हें बीज उगाने की टैªनिंग दी जायेगी। और इसे उगाना इतना कठिन नही है यह दो फीट उग जाने पर बर्फ का भी असर इस पर नही होता है। इसको जगली जानवरों, बारिस से भी किसी प्रकार का नुकसान नही होता है। हमारी रिपोर्ट जून में सरकार को जारी कर दी जायेगी। भारत में यह पहली जगह है जहां इसकी कामशियल खेती की जा रही है।बंजर खती भी इसके लिए उपयुक्त है।यह प्रोजक्ट उत्तराखंड की आर्थिकी को कायाकल्प कर देना वाला है। हम इस प्रोजक्ट को एसे वातावरण में तैयार करना चाहिते है।जिससे यह आसानी से हो सके इसके बाद हम किसानों को बीज उपलब्ध करायेगें।
डाॅ के.एस पंवार,औघोगिक सलाहकार, मुख्यमंत्री उत्तराखंड सरकार
यह प्रोजेक्ट उत्तराखंड के किसानों के लिए बडा़ रेब्नयु लेकर आयेगा। अगर किसानों को सहयोग मिला तो हेम्प की खेती इतना सफल प्रयोग होगा कि जो लोग गांव छोड़कर बाहर चले गये है वे वापस गांव में आकर इसकी खेती करेगें और उन्हे अच्छे स्तर पर इसका रेबन्यु भी मिलेगा।अभी प्रयोग के तौर पर उत्तराखंड के चार जिलों में जिनमें दो गढवाल और दो कुमांउ जोन में है इसका पायलेट प्रोजक्ट चल रहा है। जहां पर भी इसकी क्वालटी और उत्पादन अच्छा होगा वही इसकों वृहद रूप दिया जायेगा।हेम्प की खेती को बडावा देने का सरकार का मुख्य उद्देश्य है कि पहाडों से पलायन रूके किसानों और बेरोजगारों को रोजगार के लिए भटकना न पडे हेम्प एसोसिएसन अपनी मार्केटिग खुद करेगा।मेरा मानना है कि हेम्प की खेती से इतना रोजगार मिलेगा कि कई जिलों के गांवों में 100 प्रतिसत तक पलायन रूक जायेगा।