हर्षिल घाटी के 50 प्रतिसत से अधिक सेबों की फसल खराब,उद्यान विभाग नहीं ले रहा सुध, किसान मायूस

भानु प्रकाश नेगी,
रिपोट-जीरो ग्राउड,मुखवा गांव(उत्तरकाशी)


अपनी नैसगिंग सुन्दरता,शुद्व व स्वास्थ्यवर्धक वातावरण और स्वादिस्ट सेब और राजमा की दाल के लिए प्रसिद्व हर्षिल घाटी देश और दुनियां के सैलानियों के लिए विशेष आर्कषण का केन्द्र रहा है।करोडों हिन्दुओं की आस्था व विश्वास का प्रतीक माॅ गंगा का  विश्व प्रसिद्व पवित्र मंदिर इस घाटी में होने के कारण हर साल लाखों श्रृद्धालु यहां पर दर्शन के लिए आते है।हर्षिल घाटी के मुखवा गांव में मां गंगा की शीतकालीन पूजा की जाती है।मुखवा गांव में मां गंगा व ग्राम देवता सोमेश्वर का प्राचीन और भब्य मंदिर स्थित है। जहां पर भक्त शीतकाल में मां गंगा व सोमेश्वर देवता के दर्शन करते है।

हर्षिल घाटी में विल्सन नामक अग्रेज द्वारा 1864 में पहली बार इस क्षेत्र में सेब का पेड़ रोपा गया था,जो इंग्लैण्ड से लाया गया था।तब से यहां पर सेब की खेती का प्रचलन हुआ और अब इस घाटी में सेब ही मुख्य फसल है।जो यहां के किसानों की आय का मुख्य जरिया बना हुआ है।लेकिन इस बार जनपद उत्तरकाशी के हर्षिल घाटी के आठ गांवों में सेब की फसल को स्केब,स्केल,पतझड़ आदि का रोग लग गया है। जिससे यहां पर सेबों की 50 प्रतिसत से ज्यादा फसल खराब हो चुकी है।सालभर की मेहनत के खराब होने से यहां के किसान काफी मायूस है।किसानों का कहना है कि उद्यान विभाग की लापरवाही से उनकी फसलों को नुकसान पंहुचा है। विभागीय कीटनासक इतनी घटिया किस्म के है कि उससे एक साधारण कीट भी नहीं मर रहा है। समय पर किसानों को सही कीटनासक और सेब पर लगने वाले रोगों के बारे में जानकारी मिल जाती तो उनकी सेबों की फसल खराब नहीं होती।

सेब की फसल के लिए सबसे मुफिद माने जाने वाले हर्षिल घाटी के सेब देश और दुनियां में प्रसिद्व है।उचित जलवायु होने के बावजूद आज तक यहां का सेब ब्रांड नहीं बन पाया है।आज भी यह सेब हिमाचल सेब के नाम से बाजार में बिक रहा है। जिससे यहां के किसान काफी मायूस हैं। किसानों का कहना है कि हमारी मेहनत का फायदा दूसरे राज्य के लोग ले रहे है जिसका उन्हें काफी मलाल है।राज्य सरकारें देहरादून के ए सी कमरों में बैठकर बडी -बडी मीटिंग और सेमिनार करती है,लेकिन राज्य निर्माण के 19 साल बाद एक दिन के लिए भी कोई विभागीय अधिकारी व कर्मचारी सेब के खेतों में देखने तक नहीं आये।जिससे विभागीय अधिकारी व मंत्री किसानों की मूल समस्याओं से रूबरू नहीं हो पाते है।नतीजतन किसानों को भारी नुकसान झेलना पडता है।

 देशभर में तीन राज्य जम्मू-कश्मीर,हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड ही मुख्य सेब उत्पादक है। जिसमें सबसे कम सेब उत्तराखंड में होते है।जम्मू -कश्मीर व हिमाचल का सेब देशभर के अलावा विदेशों में भी जाता है। उत्तराखंड में राज्य सरकारें सेब की खेती के लिए कागजी योजनायें खूब बना रही है,लेकिन विभागीय अधिकारियों की रूचि न होने के कारण यहां पर सेबों की गुणवक्ता और उत्पादकता में खास ईजाफा नहीं हो पा रहा है।जबकि यहां पर सेब उत्पादन के लिए कई पर्वतीय जिलों में उचित जलवायु है। बस जरूरत इस बात की है कि उद्यान विभाग के अधिकारी और मंत्री किसानों की जमीनी हकीकत से रूबरू हो, किसानों को समय -समय पर उच्च गुणवक्ता के कीटनाशक,कृषि यंत्र,उचित प्रसिक्षण,और विपणन की व्यवस्था हो,तभी सेब के किसान खुशहाल और राज्य आर्थिक तरक्की कर पायेगा।