हरदा की सोशल मीडिया पर सुनामी

देहरादून-राजनीति के पुरोधा माने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की पार्टी और संगठन को लेकर चल रही तकरार खत्म होने का नाम नही ले रही है। अब बात निकली है तो दूर तक जायेगी,ये उस वक्त तय हो गया था जब हरीश रावत ने अपने जज्बात सोशल मीडिया मीडिया के प्लेटफार्म जाहिर किये थे।और उत्तराखंड विघानसभा चुनाव के लिए चेहरा घोषित करने की बात कही थी। कांग्रेस पार्टी के लिए हरदा की बात धीरे से दिए गये जोर के झटके से कम नहीं है।मीडिया ने कुरेदा तो विपक्ष की राजनीति के तरीके और राज्य में कांग्रेस की सेहत का हवाला दे दिया।

उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव के लिए एक साल से ज्यादा का वक्ता बाकी है।लेकिन हरदा जैसी पारखी नजरों के लिए ये वक्त इतना ज्यादा नहीं है कि पार्टी की चादर से गुटों में बंटी कांग्रेस की सलीके से पोटली बनाई जा सकें। दरअसल देखा जाय तो साल 2017 के विधानसभा चुनाव मंे मिला करारी हार से कांग्रेस अभी तक उभर नहीं पाई है।उपर से राज्य मंे पार्टी की मौजूदा कैप्टनशिप से हरदा नाराज भी है,जिसका वह मीडिया से जिक्र कर चुके है।

हरीश रावत का पोर्टफोलियो देखा जाय तो खुद को राज्य में तीरंदाज मानने वाले मौजूदा दिग्गजों से काफी स्ट्रांग है।हरदा केन्द्र मे कई मंत्रालय संभाल चुके है जबकि उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भी रह चुके है तो संगठन के कई महत्वपूर्ण पदों पर भी रह चुके है। राज्य गठन के बाद जब से राज्य में कांग्रेस की पहली निर्वाचित सरकार बनी है,उस वक्त हरीश रावत प्रदेश के अध्यक्ष थे।बहरहाल सियासत के तराजू में हरदा की बात को उनके अनुभव का वनज मिलने लगा है।

प्रदेश के मौजूदा प्रदेश प्रभारी देवेन्द्र यादव के आने के बाद उत्तराखंड कांग्रेस में हलचल हुई है। गुटबाजी भी खुलकर सामने आने लगी है।उनके दौरे और सीधे संवाद से बहुत सी बातें उनके सामने आई है। सूत्रों की माने तो प्रदेश प्रभारी कांग्रेस के मौजदा हालात से खुश नहीं है और संगठन में धडे़बाजी को लेकर उनके तेवर भी कडे़ दिखाई दे रहे है।एक गुट का मानना है कि प्रदेश प्रभारी को गलत फीडबैक दिया जा रहा है और हरदा जैसे अनुभवी शख्स को किनारे करने पर तुले है।
बहरहाल हरदा के बडे इजहार के बाद एक धड़ा हरदा के पक्ष में खुलकर आ गया है,तो दूसरा धडा चुनाव से पहले सेनापति का चेहरा घोषित करने की मांग को कांग्रेस की परंपरा के खिलाफ बात रहा हैं सूबे में कांग्रेस के मौजूदा कप्तान की टीम के कई सदस्य बेसक कांग्रेस की परंपरा का हवाला दे रहे हो लेकिन हरदा ने अपनी बात का वनज बढाने के लिए कांग्रेस के पिछले इतिहास का जिक्र भी किया हैं, कि कांग्रेस ने कब कब चुनावी जंग में उतरने से पहले सेनापति का ऐलान किया।

हरीश रावत के तेवरों से साफ हो गया है कि हरीश रावत मौजूदा प्रदेश नेतृत्व से खुश नहीं है और आर पार की लड़ाई लड़ना चाहते है। ताकि चुनावी जंग से पहले गुटों में बंटी कांगे्रस को उंगलियों को पंजा बनाया जा सके। ऐसे में माना जा रहा है अगर पार्टी आलाकमान ने हरीश रावत की बात को तरजीह दी तो उत्तराखंड मे कांग्रेस का कप्तान बदला जा सकता है और हरीश रावत या उनके पसंदीदा शख्स को पार्टी की कमान सौपी जा सकती है। होगा क्या यह ता बक्त ही बतायेगा बहरहाल सियासी गलियारे में कयासों का दौर जारी है और हरदा कांग्रेस में जान फूंकने ओर अपना रिपोर्टकार्ड मजबूत करने के लिए सूबे के दौरों में व्यवस्त है।