श्रीनगर जल विधुत परियोजना: GVK कंपनी ने 90 लोगों को नौकरी से निकला.

उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश भी कहा जाता है। इसकी वजह है जगह जगह बांधों से बिजली का निर्माण। ऐसे ही श्रीनगर जल विद्युत परियोजना के लिए भी  लोगों ने निजी कंपनी को खुशी खुशी अपनी जमीन दी और एक परियोजना को साकार होने का सपना देखा। परियोजना पूरी भी हो गई , बिजली का उत्पादन भी होने लगा फिर ऐसा क्या कारण है कि लोगों को लग रहा है कि उन्हें छला गया।

  श्रीनगर अलकनंदा नदी के किनारे इस डेम की शुरुआत जीवीके कंपनी के जरिए 2006 में की गई। उसी वर्ष कंपनी ने निर्माण कार्य भी शुरू किया। और महज 9 वर्षों के अंदर कंपनी ने बिजली का उत्पादन करना शुरु कर दिया। आपको बता दें कि इस जल विधुत परियोजना से 330 मेगावाट बिजली उत्पादन किया जाता है।  जिसका 12 प्रतिशत बिजली उत्तराखण्ड को मिलती है और बाकी उत्तरप्रदेश को दिया जाता है।  जिससे उत्तरप्रदेश को इस परियोजना से काफी फायदा मिल रहा है।

  आपको बताएं कि  इस जल विधुत परियोजन को बनाने के लिए श्रीनगर के ग्रामीणों ने अपनी भूमि जीवीके कंपनी को दे दी थी।   जिसकी एवज में कंपनी ने वहां के लोगो को 30 साल तक  नौकरी पर रखने  का आश्वासन दिया था ।  साथ ही उसके लिए बाकायदा बांड भी भरे गए थे। इससे लोग खासकर युवा अपने भविष्य के बारे में आश्वस्त हो गए थे। एक तो कंपनी ने जमीन के बदले पैसे दिए थे साथ ही उनके पास अपने ही इलाके में रोजगार का जरिया हो गया था। खास बात यह है कि जब कंपनी के जरिए  लोगों से बांड भरा गया था वहा के एसडीएम ग्राम  प्रधान व जिलाधिकारी सहित कई उच्च अधिकारियो की देखरेख में  यह बांड भरा गया था

 लेकिन आज वहां काम कर रहे कई लोगो पर नौकरी का संकट गहरा रहा है।  क्योकि कंपनी  लोगों को रोजगार में रखने से मुकर रही है। कंपनी ने पहले 14 कर्मचारियों को अनुशासनहीनता के बहाने नौकरी से निकाला । और अब  90 लोगों पर गाज गिरी है। कंपनी ने 90 लोगो को नौकरी से निकाल दिया है जिससे उन लोगो पर रोजी रोटी का संकट आ गया है और वह अब दर दर की ठोकरे खा रहे है । उनके सामने दिक्कत यह है कि नौकऱी को लेकर आश्वस्त होने के बाद उन्होंने कहीं और आवेदन नहीं किया । ऐसे में उम्र बढ जाने से अब उनके सामने नई नौकरी हासिल करने का संकट खडा हो गया है। इस तरह कंपनी के छलावे से वह मुश्किल में पड गए हैं। अब उनके पास अपनी जमीन भी नहीं है।

 श्रीनगर की इस  जल विधुत परियोजना  का शुरू में लोगों ने काफी विरोध किया था। तब यहाँ के ग्रामीणों के समर्थन में  भाजपा की वरिष्ठ नेत्री उमा भारती भी इसके विरोध में उत्तरी थी।  लेकिन उसके बाद जैसे तैसे कंपनी ने तरह तरह के आश्वासन प्रलोभन देकर मना लिया। और परियोजना के लिए जमीन ले ली। हालांकि ग्रामीण यह भी कह रहे हैं कि अभी तक कई लोगों को उनकी जमीन का मुआवजा भी कंपनी पूरी तरह से नहीं दे पाई है। पहले ग्रामीण नौकरी में होने की वजह से अपनी इस बात को नहीं उठा रहे थे, लेकिन अब वे इस पर खुलकर बोल रहे हैं।  और शीघ्र आंदोलन की धमकी दे रहे हैं।

 कर्मचारियों के निकाले जाने को लेकर जब हमने कंपनी के डिप्टी जनरल मैनेजर से बात की तो उनका कहना है कि  अब इन कर्मचारियों को देने के लिए  उनके पास कोई काम नहीं है जिसके चलते इन्हे निकाला जा रहा है।

जब कंपनी श्रीनगर में 2006 में आयी थी तो उस समय वह के ग्रामीणों ने डेम बनाने को लेकर काफी विरोध किया था और कई बार हंगामा भी किया गया था लेकिन बाद में कंपनी ने प्रभावित  हुए ग्रामीणों से एक बांड के आधार पर वहा के लोगो को 30 साल तक नौकरी देने की बात की थी जिसके चलते वहा पर डेम का निर्माण किया गया था  जिसको कंपनी भी मान रही है लेकिन कई लोगो को  निकाल भी दिया है। उनका कहना है जिन लोगो की उपयोगिता होगी उनके लिए विचार भी किया जायेगा

कंपनी द्वारा ग्रामीणों से 2009 में एक अनुबंध किया गया था जिसमे यह साफ़ तार पर लिखा गया था अनुबंद में कहा गया था कि विश्व विद्यालय की तर्ज पर जिसकी भी नौकरी थी उसका वेतन मान उसके तर्ज पर दिया जाए

वहां के लोगो के पास अब कुछ भी अब अपना नही रहा सब कुछ कंपनी के नाम कर दिया साथ ही कंपनी मे कर रहे लोगो के पास भी अब रोजगार का संकट आ गया ऐसे मे वहां जाये भी तो कहां कपनी उन्हे काम देने से मना कर रही है दूसरी जगह वह काम नही कर सकते ऐसे मे यह देखना होगा कि वहां के लोग कंपनी के इस रवैया पर क्या कदम उठाती है और कंपनी कब तक उन्हे काम पर रखती है