गोवंस की इस र्दुदशा के लिए जिम्मेदार कौन? पं. चन्द्रबल्लब भट्ट

पिछले 2014 के चुनाव के बाद जैसे ही दिल्ली की सल्तनत और उत्तर प्रदेश मे कमल का कब्जा हुआ। गोवंश को बचाने की पुरजोर मांग उठी। संत समाज से लेकर दूसरे गोरक्षक संगठन लामबंद हुए। सरकार से गोरक्षा की मांग होने लगी।
नतीजा ये हुआ कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अवैध बूचड़खानों पर प्रतिबंध लगा दिया। गैरकानूनी बूचड़खानो पर बंदिश लगने के बाद परमिटधारी कत्लगाहों की पौ-बारह हो गई। उनका माल ऊंचे दामो पर बिकने लगा। लेकिन इधर एक संकट उभर कर सामने आ खड़ा हुआ है। जिसका असर सीधा-सीधा गोवंश पर तो पड़ ही रहा है। साथ ही साथ गांवों में किसान और नगरों में ट्रैफिक भी खामियाजा भुगत रहा हैं।



दरअसल जब से गांवों में खेती-किसानी में तकनीक का दखल हुआ है, किसानों की बैलों पर निर्भरता कम हो गई है। लिहाजा नर गोवंश की दुर्गति हो गई है। हालांकि कभी एक जामना वो भी था जब गांव में गाय नर शिशु को जन्म देती थी तो पशुपालक किसान गुड की भेली आस-पड़ोस में बटंवाता था।
इस बात की तस्दीक करती है देहरादून जिले के रानीपोखरी गांव में गोदावरी देवी। दरअसल गोदावरी देवी के घर अभी उनकी गाय ने नर शिशु को जन्म दिया। उनके मुहं से अनायास ही निकला “काश पैली जनू वक्त होंदू त खेती का खातिर बल्द मिली गै थौउ, पर अब क्या कन! ऐ निर्भागी त्वै सणी त पाली पोसिक जंगल ही छोंण पड़लू”
मतलब अगर पहले वाला वक्त होता तो नर गोवंश शिशु बैल बनता लिहाजा उसकी खूब हिफाजत होती। पूरे दो-दो थन दूध के पिलाए जाते लेकिन वक्त बदल गया अब बैलों से खेती होती नहीं, लिहाजा न तो नर गोवंश को भरपेट मां का दूध पिलाया जाएगा और जैसे ही वो पांच छ महीने का होगा उस बेचारे को जंगल में आवारा छोड़ दिया जाएगा। जहां वो संघर्ष कर सका तो जिंदा रहेगा वरना बेचारा भूख से बिलबिला कर मर जाएगा।


वहीं अगर नर गोवंश शहर की ओर गया तो ट्रैफिक के लिए मुसीबत बनेगा और गांव की ओर गया तो उसकी भूख उसे खेतो की ओर ले जाएगी जहां वो किसान के लिए बडी परेशानी बन जाएगा और उसके गुस्से का शिकार होगा। उस नर गोवंश पर लाठियां भांजी जाएंगी और उसे खेतों से खदेड़ कर फिर रास्तों की ओर धकेला जाएगा। यानि अब बदलते वक्त में नर गोवंश की गांव और शहरों में दुर्गति ही हो रही है।
उत्तराखंड जैसी देवभूमि में तो नर गोवंश का बुरा हाल है। पलायन के चलते छोटी जोत वाले पहाड़ी गांव लगातार खाली हो रहे हैं लिहाजा वहां भी अब नर गोवंश की मांग नहीं रही। लिहाजा नर गोवंश सड़कों पर आवारा फिर रहे है और यातायात के लिए मुसीबत का सबब बन रहे हैं। वहीं गांवों में भी किसान नरगोवंश को लेकर तकलीफ का सामना कर रहे हैं।
सख्ती के चलते अब न तो नरगोवंश के खरीददार रहे जबकि निजी दुत्कार और सरकारी संरक्षण के आभाव में नरगोवंश की फजीहत ही हो रही है। हालांकि बताया जा रहा है कि अब नई तकनीक के चलते कृत्रिम गर्भाधान से सिर्फ मादा गोवंश की ही पैदायश होगी लेकिन जहां कृत्रिम गर्भाधान न हो पाया वहां नर गोवंश की संभावना बरकरार है।
ऐसे में जरूरत है एक बड़ी पहल की ताकि नर गोवंश की समाज में दुर्गति न हो पाए। इसके लिए जरूरी है कि सरकार, धार्मिक संस्थाओं, जीव जंतु प्रेमियों और अपने कोष से उन किसानों और पशुपालकों की मदद करे तभी वो नर गोवंश को पालने में दिलचस्पी दिखा सकते हैं। इससे जहां नर गोवशं की फजीहत नहीं होगी वहीं वो सड़कों पर आवारा फिरते हुए खेतों की फसलों के लिए मुसीबत का सबब नहीं बनेंगे।

-पं. चन्द्रबल्लब भट्ट