ढूडने से भी नही मिले सरकारी स्कूल के लिए विद्यार्थी।

आखिर कब सरकारी शिक्षा बदहाल बदलेगी तस्वीर।

/ /भानु प्रकाश नेगी//

सूबे की शिक्षा व्यवस्था की बदहाली किसी से छुपी नही है। यूं तो यह बदहाली राज्य निमार्ण से पहले भी थी लेकिन उस समय सरकारी स्कूलों में विद्यार्थीयों का टोटा नही होता था। राज्य निर्माण के बाद सरकारी की बुनियादी सुविधाऐ (शिक्षा, स्वास्थ्य,रोजगार) पर जमीनी तौर पर ध्यान न देने के कारण यहां के गांवों से पलायन बदस्तूर जारी है। जिसके कारण सरकारी स्कूलों मे विद्यार्थियों की संख्या साल दर साल कम होती जा रही है।जो अध्यापकों के लिये भी चिन्ता का सबब बना हुआ है।

ताजा मामला चमोली जिले के पोखरी ब्लाक के राजकीय  उच्च प्राथमिक विद्यालय सिमखोली का है जहां वर्तमान में छात्र-छात्राओ की संख्या मात्र 10 रह गई है।स्कूल के प्रधानाध्यापक लखपत सिंह गुसाई का कहना है कि इस सत्र के लिए विद्यार्थीयों की खोज के लिये पास के गांव काण्डई,इज्जर गये लेकिन ढूड़ने से भी विद्याथी नही मिले तो बडी निराशा हुई।
स्कूल परिसर के लिए अपने स्टाफ के साथ मिल कर 50हजार तक खर्च कर चुके प्रधानाध्यापक तन -मन- धन से स्कूल में बच्चों का भविष्य संवार रहे है।लेकिन उन्हें दुख इस बात का है कि इतना अच्छा शैक्षिक माहौल होने के बावजूद भी अभिभावक अपने बच्चों को निजि स्कूलों में मोटी रकम की फीस देकर करा रहे है।
अधिकतर महिलाओं का घरेलू काम काज पर ध्यान न होने की वजह से अपने परिवारो से शहर में बसने की जिद करते है।
प्रायवेट स्कूलों में कई प्रकार की अनावश्यक फीस साल दर साल बढने से आम आदमी पर आर्थिक बोझ पड रहा है। इसके कारण आजकल कई लोग मानसिक बीमारियों का शिकार हो जाते है।
उन्होने बताया कि हमारी स्कूल के बच्चों का परीक्षाफल शत प्रतिसत रहता है। किसी भी बच्चे के अंक 75 प्रतिसत से कम नही रहते है हमारे विद्यालय में विद्याथियों को कम्प्युटर की शिक्षा भी दी जाती है।साथ ही बच्चों को नैतिक शिक्षा,सामान्य ज्ञान,खेलकूद प्रतियोगिता आदि करायी जाती है ताकि बच्चों का सम्पूर्ण शाररिक और मानसिक विकास हो सके। इसके बावजूद भी बच्चों की संख्या का लगातार घटना चिन्तनीय है।
पलायन आयोग की प्रथम रिपोर्ट में प्रदेश के 850 गांवों में लोग रिवर्स पलायन कर रहे है।और सरकार ने भी यह माना है कि शिक्षा,स्वास्थ्य,रोजगार की बदहाली से पलायन हो रहा है ,लेकिन यह बात कई रिपोर्टो व ,पहाड़ को नजदीक से समझने वाले लोग कई बार दे चुके है फिर भी इस मर्ज की दवा क्यों नही खोजी जा रही है?आखिर जिन पहाड़ी जिलों के लिए मूल रूप से उत्तराखंड राज्य की मांग की गयी थी उन्ही की क्यों अनदेखी की जा रही है।पहाड़ की राजधानी गैरसैंण में बनाने का मुद्दा दोनो राष्ट्रीय दलों के लिए फुटबाॅल क्यों बना हुआ है? इन सब सवालों के संतुष्ठ कर देने वाले जवाबों का इंन्तजार समाज के अंतिम छोर पर बैठा मूल उत्तराखंड़ी मांग रहा है।

अपरोक्त वाक्या सिर्फ जनपद चमोली के सिमखोली उच्च प्राथमिक विद्यालय का नही है, बल्कि सूबे के सैकडों स्कूलों के हालत यह हो गये है कि छात्र संख्या मानक से कम होने पर स्कूलों को बंद करना पड रहा है ।और अभी तक कई स्कूल बंद भी हो गये है ।
एक ओर सरकारें अध्यापकों के लिये कई प्रकार की परीक्षाओं को अनिवार्य कर उन्हें आधुनिक शिक्षा के लिए तैयार करके स्कूलों में भेज रही है वहीं दूसरी ओर तमाम कारणों से स्कूलों में छात्र-छात्राओं की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है।जिससे सरकारी स्कूलों के अध्यापकों के भविष्य पर तलवार लटकी हुई है।
बहरहाल सरकार का कहना है कि रोग का पता चल गया है अब मर्ज की दवा की जायेगी। कुछ समय और इंताजार किया जाना चाहिये, हो सकता है कि दवा से सूबे की हालत सेहतमंद हो जाय ?