हर पल मन में रही अपनी संस्कृति पहाड़ी सिनेमा,टी बी का चर्चित चेहरा गिरिश सनवाल “पहाड़ी“

भानु प्रकाश नेगी


बहुमुखी प्रतिभा के धनी है गिरीश सनवाल।
बचपन से था अभिनय का शौक
गढ़रत्न नरेन्ंद्र सिंह नेगी की एलबम स्याली हे बंसती स्याली से मिली नई पहिचान।
नुक्कड़ नाटकों से भी करते है,जनजागरूकता फैलाने काम।


  • पिछले दिनों उत्तराखंड के चर्चित लोक कलाकार गिरीश सनवाल पहाड़ी से मुलाकात हुई तो उन्होंने अपने कला जगत के संर्धष के बारे में कई बातें कही। उनका कहना है कि बचपन से ही उनके अन्दर एक कलाकार आ चुका था,जब मास्टर जी कवितायें पढते थे तो उनके दिमाग में पिक्चर बननी शुरू हो जाती थी।स्कूली कार्यक्रम में लगातार प्रतिभाग वह किया करते थें। गिरीश कहते है कलाकार वही बनता है जो किसी की भावनाओं को समझ जाता है और कला को महसूस करने का जज्बात रखता है।कलाकारी के लिए जब वह अपनी ही दुनियां में खो जाते थे। तो उन्हें कई बार घर वालों से मार भी खानी पड़ी।
    जहां चाह वहां राह यह कहावत सटीक बैठती है,उत्तराखंड के लोक कलाकार गिरीस सनवाल पर,बचपन से ही अभिनय में रूचि रखने वाले गिरीस सनवाल का जन्म जनपद अल्मोडा के तिमलढैया,साल्द में स्वा.हीरा बल्लभ सनवाल और बीना देवी के घर साधारण परिवार में हुआ। सन् 2000 से लगातार लोककला एवं अभिनय लेखन गायन आदि क्षेत्र में निरंतर कार्यरत गिरीस सनवाल पहाडी के उप नाम से भी जाने जाते है। 2004 में कुमाउंनी डबिंग कुमाउनी शोले,हंत्या,ब्यो।
    गिरिश सनवाल की पहली फिल्म अनुज जोशी के निदेशन में बनी “गट्टू अर कलजुगी द्यवता“ थी जिसमें उन्होंने गुदड्या का रोल निभाया था।इसके बाद गिरीस ने पीछे मुड़कर नही देखा जिनमें हेमन्त शर्मा की प्यार जितेंगे न,बगछट,गुल्लू,अब खा मॉछा,मेरी संगोड़ी प्रमुख रही।
    उन्होंने बताया कि होश संभालने के बाद देहरादून से दिल्ली गया तो शहर की चाकाचौध ने मुझे एक बार के लिए हॉलीबुड की ओर आकर्षित किया। लेकिन मुझे पिताजी की वो बातें याद आ गई कि बेटा अपनी लोकभाषा,संस्कृति,व अपने लोगों को कभी मत छोड़ना दिल्ली में रह कर मैने कुमाउंनी सीखी और बाद में देहरादून में आकर लोककला की ओर बढा यहां मैने दोस्तों से गढवाली सीखी।नरेन्द्र सिंह नेगी की एक एलबम के गीत स्याली हे बसंती स्याली ने मुझे नई पहचान दी,मिन त सोची लाटी होली काली होली वो भी सुपर हिट रहीं। इसके बाद सीरियल में सीआई डी,छल में काफी समय तक काम किया।
    वह कहते है कि “मै अभी अपने कार्य से संतुष्ट हूं।मैने विभिन्न प्रकार के कला क्षेत्रों में काम कर अपना रोजगार चला रहा हूंॅ। इसमें लेखन,गायन,अभिनय,कैमरा आदि से रोजगार पा रहा हूं। गिरीस पहाड़ी का कहना है कि संस्कृति विभाग कलाकारों के बारे में सोचता तो है लेकिन उनकी सोच कितनी कामयाब हो रही है। यह एक प्रश्न बना हुआ है।कलाकारों का रोजगार नहीं मिल पा रहा है,यहां कलाकार सिर्फ अपना शौक पूरा कर रहे है“।
    नवोदित कलाकरों के लिए पहाडी का संदेश है कि अवसर का निर्माण करो इंतजार नहीं। अगर आप अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पा रहे है,तो अनुभवी लोगां से चर्चा करें और अपने काम के प्रति लगन और मेहनत से काम करें कुछ अलग तरीके से काम करने की कोशिश करें सफलता जरूर हाथ लगेगी।
    पहली फिल्म
    गट्टू अर कलजुगी द्यवता
    1 प्यार जितेगे न
    2 बगछट
    3. गुल्लु
    4.अब खा मॉछा
    5.मेरि सगोड़ी
    नरेन्द्र सिंह नेगी के गीतों में अभिनय
    गीत – स्याली हे बसंती स्याली,हाथन हुस्की पिलाई फूलन पिलायो रम।जी रे जागि रे,मिन त समझि लाटि होलि।
    दूरदर्शन में नाटक-नटखट खिलाडी,दूरदर्शन के लिए लोकगीत एवं लोकनृत्य कार्यक्रमों में अभिनय।
    हिन्दी टीबी सीरियल में छोटे पात्रों का अभिनय
    सी आई डी,छल,एवरेस्ट।
    हिन्दी फिल्म
    डियर डेड,पिंटी का साबुन,
    नाटक
    दर्द ए ताजमहल,अलख,मत मारो
    जीवन दायनी गंगा (निर्देशन)
    हिमबीर (निर्देशन)
    सामाजिक अभियान
    बेटी बचाओं बेटी पढाओं,स्वच्छ भारत मिसन,नमामि गंगे,हिमालय बचाओं,ध्रूमपान निषेद्व,
    वर्तमान कार्यक्रम
    संस्कृति एवं सामाजिक संस्था के माध्यम से उत्तराखंड की लोक संस्कृति के प्रचार प्रसार की लोक के लिए प्रचार प्रसार,संर्वधन और नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से जन जागरूकता कार्यक्रम।