उत्तराखंड में ग्लेशियर संस्थान क्यों हैं जरूरी, जाने इस खास रिपोर्ट में

-भानु प्रकाश नेगी


देहरादूनःउत्तराखंड प्राकृतिक खूबसूरती के साथ-साथ देश और दुनियां का तीर्थटन व पर्यटन का हब बनता जा रहा है।यहां आने वाले श्रृद्वालुओं व सैलानियों की तादात साल दर साल बढ़ती जा रही है।लेकिन मानव की अधिक आवाजाही और प्राकृतिक छेड़ छाड़ के कारण हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की रफतार साल दर साल तेज होती जा रही है।जिसके कारण यहां पर समय-समय पर प्राकृतिक आपदायें आती रहती है,नतीजतन भारी जन और धन हानि होती है।
वर्ष 2013 में ग्लेशियर पिघलने के  कारण  चौराबाड़ी झील फटने से केेदारनाथ क्षेत्र में आई भारी तबाई के जख्म अभी भरे भी नहीं थे कि, 7 फरवरी 2021को रैणी तपोवन क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने से आई बाड़ ने चंद मिनटों में भारी तबाही मचा कर जन व धन की छति कर दी। हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों की संवेदनशीलता को और भविष्य में आने वाले संभावित खतरे को देखते हुए प्रदेश में ग्लेशियर संस्थान बनाये जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।


क्या कहते है भू-बैज्ञानिक


साल 2002-2012 तक नंदा देवी बाॅयोस्फेयर क्षेत्र में ग्लेशियरों पर रिसर्च कर चुके वर्तमान समय में उत्तराखंड उपयोग केन्द्र के निदेशक प्रोफेसर एमपीएस बिष्ट का कहना है कि ऋषिगंगा से नंदादेवी तक मैने तीन बार एक्सपटीसन किया है।इस इंटायर एरिया में 14 ग्लेशियर है,जिन्हें मैने अपने पांवो से नापा है।पर्वतीय भाग के रैवासियों की आजीविका,दिन रात की प्रक्रिया इन्हीं ग्लेशियरों से है।विश्व का 3 प्रतिसत पीने योग्य जल इन्हीं ग्लेशियरों से मिलता है।अगर आज से हम इनकी चिन्ता न करें तो भविष्य में इसके गंभीर परिणाम हो सकते है।इस विषय पर विशेष शोध की आवश्यकता है।राज्य सरकार से निवेदन है कि उत्तराखंड के अन्दर एक ऐसा संस्थान बनाया जाना चाहिए जो खास तौर पर इन पहाड़ी क्षेत्रों में इन हिमालयी क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए ग्लेशियर की सुरक्षा व महत्व को देखते हुऐ ग्लेशियोलाॅजी का स्पेशल संेटर होना चाहिए।
-प्रो. एम.पी.एस. बिष्ट,निदेशक उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केन्द्

 


हिमालय क्षेत्रों को पर्यावरण की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण व संवेदनशील माना गया है। बीते दशकों में हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने में तेजी आई है।वर्ष 2019 की स्टेडी के अनुसार 40 सालों तक भारत,चीन,नेपाल,भूटान में फैले ग्लेशियरों पर नजर सैटिलाइट के जरिये नजर रखी गई। एक अध्ययन के अनुसार हिमालयी क्षेत्र के लगभग 650 ग्लेशियर पिघल रहे है।1975 से 2000 तक हर साल औसतन 400 करोड़ टन बर्फ पिघलती रही,लेकिन इसके बाद के सालों मंे ग्लेशियरो के पिघलने की रफतार दो गुनी हो चुकी है।


लगातार घट रहे है ग्लेशियर,ग्लोबल वर्मिंग कारण


एक शोध के मुताविक 25 सालांे मंे हिमालय रेंज के ग्लेशियर जहां हर साल 10 इंच घट रहे थे,वही 2000 से 2016 के बीच हर साल औसत 20 इंच तक घटे। दो हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी पट्टी में फैले हिमालयन क्षेत्र का तापमान ग्लोबल वर्मिंग की वजह से एक डिग्री तक बड़ चुका है।अगर ग्लोबल वर्मिग के मध्यनजर चलाये जा रहे ग्लोवल क्लाइमेट प्रयास नाकाम हुए तो साल 2100 तक हिमालय क्षेत्र के दो तिहाई ग्लेशियर पिघल चुके होगें।ग्लोवल वर्मिंग से निपटने के लिए जो महत्वाकांक्षी पेरिस समझौता हुआ उसका लक्ष्य है कि इस सदी के आखिर तक ग्लोवल वर्मिंग को एक डिग्री तक सीमित किया जाय ऐसा कर पाने के बावजूद अब तक 2.1 तक डिग्री तापमान बड़ चुका है।


पूर्व में भी आ चुकी है है हिमालय क्षेत्र में बाढ़़


रैंणी तपोवन क्षेत्र में आई प्रकृतिक आपदा से पहले भी अलकनंदा के इस कैचमैंट क्षेत्र में तीब्र ढ़ाल वाले नदी-नाले पूर्व में भी अनेक बार विप्लब मचा चुके है।सन 1868 में चमोली गढ़वाल के सीमांत क्षेत्र में झिन्झी गांव के निकट बिरही में एक गोडियार ताल नाम की ताल बनी जिसके टूटने से अलकनंदा में भारी तबाही हुई,जिसके कारण 73 लोगों की जान गई।सन 1893 में गौणा गांव के निकट एक शिलाखण्ड के टूट जाने से नदी बिरही नदी में फिर झील बन गई 4 किलोमीटर व 700 मीटर चौड़ी यह झील 26 अगस्त 1994 को टूट गई जो श्रीनगर गढ़वाल का आधा हिस्सा बहा कर ले गई।बद्रीनाथ के निकट 1930 में अलकनंदा फिर अवरूध हुई 1967-68 में रैंणी गाॅंव के निकट भू-स्खलन से झील बनी 20 जुलाई 1970 में इस झील के टूटने से हरिद्वार में भारी तबाई आई


ग्लोबल बर्मिग के साथ- साथ लोकल बर्मिंग भी आपदाओं को दे रही है न्यौता


हिमालयी राज्यों में देश का लगभग 25 प्रतिसत वन क्षेत्र निहित है।लेकिन पिछले दो दसकों से हिमालयी राज्यों मंे वनावरण घटता जा रहा है। विकास के नाम पर प्रकृति के साथ अनावश्यक छेड़ छाड़ व पर्यटन व तीर्थाटन के नाम पर हिमालयी राज्यों मंे उमड़ रही मनुष्यों व वाहनों की अनियंत्रित भीड़ लगातार प्राकृतिक संकट को न्यौता दे रही है।हिमालयी क्षेत्रों मंे ऋतुओं में आ रहे परिवर्तन के लिए केवल ग्लोबल वर्मिंग को का फैक्टर ज्यादा असर कारक है। भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग की 1995-2017 की रिपोटों पर गौर करें तो सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि हिमालय वासी अपने आश्रय दाता हिमालय के तंत्र को कितना नुकसान पंहुचा रहे है।