देहरादून में 100 साल पुराना घराट देखा है कभी?

ऽ अंग्रेजों ने की थी इस घराट की स्थापना।
ऽ स्थानीय लोगो के अलावा दूर दराज क्षेत्र के लोग भी आते है इस घराट में आटा पीसवाने।
ऽ टरवाईन भी घूमती है इस घराट से ।
ऽ सिंचाई विभाग के अधीन है यह घराट।

परम्परागत ’घराट’ से आटा पीसने का काम उस समय से उत्तराखंड मे चल रहा है जब किसी ने वैकल्पिक ऊर्जा को एक अभियान के रूप में कभी लेने की कल्पना भी न की होगी लेकिन बीते वक़्त के साथ प्रदेश मे कई घराट बंद हो चुके है,लेकिन देहरादून के मालदेवता में एक खास घराट आज भी मौजूद है,जो अपने जन्म के 100 साल पूरा कर चूका है।

देहरादून के रायपुर मालदेवता मार्ग बीते 73 साल मे इस इलाके की तस्वीर पूरी तरह बदल गयी है,लेकिन सड़क किनारे मालदेवता मे कालका नहर पर बना तकरीबन 100 साल पुराना ये घराट आज भी अपनी सेवाएं दे रहा है। अंग्रेजो के ज़माने में देहरादून के रायपुर व् मालदेवता छेत्र मे सिचाई के लिए नहरां का निर्माण किया गया कृषि कार्य को बढ़वा देने के साथ ही अंग्रेजों ने नहरों पर घराट भी बनवाए ताकि स्थानीय आबादी को गेहू,मंड़वा ,मसाले आदि पिसवाने के लिए इधर -उधर न भटकना पड़े। बीते वर्षो के साथ अधिकांश घराट खंडहर मे तब्दील हो गए लेकिन कालका नदी ये किनारे ये घराट आज भी काम कर रहा है और ये घराट पानी के प्रेशर से ये टरबाइन घूमती है, और इसमें गेहू डाल कर इसको पिसा करती है ऊपर से इनमे गेंहू डालना होता है और आटा पिस जाता है।
जहां सड़क-बिजली जैसी सुविधाएं कभी पहुंची भी न थीं, वहां उस दौर में गांव से निकलने वाली जलधाराओं के सहारे आटा, मसाला, दाल पीसने का काम ’घराट’ के सहारे चला करता था और आज भी चल रहा है घराट आज भी वैसा ही है जैसा उस दौर में हुआ करता था। काफी लम्बे समय तक बंद पड़ा रहा ये घराट जय सिंह पवार ने दुबारा शुरू किया उन्होंने बताया कि इस घराट से उन्हें रोजगार भी मिला साथ ही इसमें पिसा आटा भी काफी शक्तिवर्दका और पौष्टिक होता है.काफी लोगो को इस घराट मे गेंहू और मंडुवा पिसवाने मे रुझान रखते है, उनके पास देहरादून ,मसूरी और हर्बटपुर से लोग आटा पिसवाने आते है।

वही पूर्व मे इसी घराट को चलाने वाले शमशेर सिंह रावत बताते है कि, पुराने समय मे मालदेवता ,खेरी ,मानसिंघ ,अस्थल ,केशरवाला,बिजौली और सिमौलि सहित आसपास के कई गावं के लोग इसी घराट मे गेंहू और मसाले पिसवाते थे फिर क्षेत्र में बिजली से चलने वाली चक्कियां स्थापित होने लगी तो लोगों का यहाँ आना कम हो गया कुछ वर्ष पूर्व यह घराट बंद हो गया उन्होंने भी इस घराट को 5 साल चलाया है साथ ही ये घराट सिचाई विभाग के अधीन है और वे उम्मीद करते है कि विभाग इस घराट का रख-राखव सही करवाए ताकि हमारी ये संस्कृत और ये घराट बचे रह सके।
देहरादून के मालदेवता इलाके मे सड़क किनारे मौजूद कालका नहर मे आज भी लगभग 100 साल पुरानी घराट अपनी सेवा दे रही है और लोगो का रुझान भी इस ओर बढ़ रहा है अब उम्मीद सरकार से है कि वे इस घराट का रख रखवा सही ढंग से करवाए ताकि विलुप्ति की कगार पर मौजूद ये घराट को बचाया जा सके।

साक्षी पोखरियाल