पहाड़ो में भी सुलगने लगे है गैरसैंण राजधानी के शोले।

जलती रहे गैरसैंण राजधानी की मशाल
– गैरसैंण व रुद्रप्रयाग के बाद पूरे प्रदेश
में जनभावना का उमड़ने लगा सैलाब
-रुकना नहीं, झुकना नहीं, टूटना नहीं

आज गैरसैंण राजधानी का आंदोलन चिन्गारी से आग का रूप ले रहा है। युवा शक्ति इस आंदोलन में कूद रही है। बेशक संसाधनों का टोटा होगा, रणनीति की कमी होगी लेकिन जज्बा और जुनून तो है ही। पिछले 18 वर्षों में गैरसैंण राजधानी का आंदोलन खड़ा हुआ फिर बैठ गया। राजनीतिक आकाओं ने जनभावनाओं को कैश कराने के लिए युवाओं का इस्तेमाल किया। और फिर गैरसैंण मुद्दे को हाशिए पर धकेल दिया। पहली बार ऐसा लग रहा है कि जब आंदोलन पिछले दो-तीन महीने से लगातार चल रहा है। या यूं कहूं कि रुद्रप्रयाग और गैरसैंण में आंदोलन धधकने लगा है। देहरादून और दिल्ली में अंगडाई ले रहा है और प्रदेश के अन्य जिलों में भी राख में दबी चिन्गारी का धुआं नजर आने लगा है।
दोस्तो, मैं ये कहना चाहता हूं कि ऐसे समय में आंदोलनकारियों का मनोबल तोड़ने की कई कोशिशे होती हैं। आंदोलन हाईजैक होने की आशंका होती है, तोड़ने और प्रलोभन का खेल होता है। आरोप लगते हैं जैसे कि पैसे खा गये, वसूली कर रहे हैं आदि-आदि।

आंदोलन एक अस्तित्व की लड़ाई होती है जिसे हर हाल में बचाना होता है। आंदोलन की तुलना उस नारी से की जाती है जो सदियों से आजादी के लिए, अपने हक के लिए, अपनी प्राकृतिक हंसी के लिए और अपने स्वाभिमान के लिए घर की चाहरदीवारी को त्याग कर पुरुषों को चुनौती देती है। उस पर लांछन लगाने वालों की कमी नहीं होती, यदि वह नारी डर जाएगी तो फिर से सदियों से पितृसत्तात्मक समाज की गुलाम बन जाएगी, लेकिन यदि डरी नहीं तो वो आगे बढ़कर एक आयाम खड़ा करती है और मिसाल बन जाती है। आंदोलन भी ऐसे ही है। दोस्तो तुम्हें घबराना नहीं है, टूटना नहीं है, रुकना नहीं है, झुकना नहीं है। यदि ऐसे ही छोटे से कदमों से ही सही, आगे बढ़ते रहे तो मंजिल दूर नहीं, देखना, एक दिन मंजिल मिलेगी जरूर।

-गुणानंद जखमोला,देहरादून।