लोकभाषा गढ़वाली- कुमाऊंनी पर गहराया विलुप्त का संकट।

इस सदी में ही लुप्त हो जाएगी गढ़वाली-कुमाऊंनी भाषा
– भाषा बचाण वला ही गुल ह्वै ग्यैनि, कु बचालु भाषा
– दुकानदारी चला रहे अखिल गढ़वाल सभा जैसे संगठन
– धाद की कसमें-वादों की भी निकल गयी हवा

दुनिया की सबसे सुंदर और मीठी वह भाषा है जो बच्चे को उसकी मां सिखाती है। यानी दूधबोली। आज उत्तराखंड में गढ़वाली और कुमाऊंनी दोनों भाषाओं पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। न सरकार को इसकी परवाह है और न ही क्षेत्र और भाषा के नाम पर दुकानदारी चलाने वाले संगठनों को ही। चाउमिन और पीज्जा खाने वाली युवा पीढ़ी को क्या पड़ी है कि वो अपनी दूधबोली को अपनाए, जबकि न वह पाठ्यक्रम में शामिल है और न ही भाषा से कोई रोजगार जुड़ा हुआ हो। सरकार तो बेसुध पड़ी है। शराब से उसकी दुकानदारी चलती है और हाथ में कटोरा लिए केंद्र पर नजर रहती है। ऐसे में भाषा से नेता व नौकरशाहों का क्या लेना-देना। भाषा संस्थान में कमीशन खोर बैठे हुए हैं और संस्कृति के नाम पर एक नेता की चेली कुर्सी पर फेबीक्विक का लेप लगाये बैठी है। वह चुन-चुन कर तय करती है कि कौन उसका है कौन पराया।
17 फरवरी को सतपुली में एक सेमिनार में गया।

उत्पादकों और पहाड़ बचाओ के सवाल को लेकर जुटे लोगों का सेमिनार था। मंच पर बारी-बारी से वक्ता आते गये। सब पहाड़ बचाने की बात कर रहे थे और उनके भाषण गढ़वाली तरज के थे, लेकिन हिन्दी में। यह पहली बार नहीं था। कई अन्य कार्यक्रमों में भी जाता हूं तो गढ़वाली-कुमाऊंनी भाषा में बात करने में हम अपने आप का असहज पाते हैं। हमारे लेखकों की लेखनी गढ़वाली या कुमाऊंनी में कम होती है और होती भी है तो उसका स्तर अच्छा नहीं कहा जा सकता है। नई पीढ़ी तो अपनी दुधबोली से दूरी बना कर चलती है। तर्क है कि निजी स्कूलों में हम बच्चे को गढ़वलि सिखाणु कू नि भिजणा छौं। उत्तराखंड ने देश को कई बड़े महान साहित्यकार दिये हैं, लेकिन हिन्दी में। हम गढ़वाली या कुमाऊंनी में एक भी अच्छा साहित्यकार नहीं दे सके या न ही इस तरह की कृति दे सके कि वह पूरे राष्ट्र को कोई संदेश दे सकें। जैसे कि बृजभाषा, मैथली ने दिया। हमारी भाषा के लिए संगठन बने लेकिन वो जल्द ही दुकान में बदल गये। अखिल गढ़वाल सभा में दुकानदारी अधिक होती है और उद्देश्य से पूर्ति कम।
यही कारण है कि पिछले दिनों अखिल गढ़वाल सभा ने वार्षिकोत्सव किया तो धन सिंह जैसा नेता भी उनके कार्यक्रम में नहंी पहुंचा। ऐसे में जब बात गढ़वाली-कुमाऊंनी को आठवीं सूची में शामिल करने की होती है तो जोर-जोर से हंसने का मन करता है। संस्कृति, प्रकृति और उत्पादकता के सवाल को लेकर धाद संस्था ने भी भाषा का बचाने का बीड़ा ठीक दो साल पहले उठाया था।

तत्कालीन निवर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत के सामने कसमें खाई कि 50 हजार लोगों के हस्ताक्षर कर राष्ट्रपति को भेजे जाएंगे। अभियान कहां और किस हाल में है, पता ही नहीं है। ऐसे में मिल गया आठवीं सूची का दर्जा। भूल जाओ और गढ़वाली-कुमाऊंनी भाषा के विलुप्त होने का इंतजार करो।

-वरिष्ठ पत्रकार गणानंद जखमोला की fb वाॅल से।