मतदाताओं की ख़राब सूची ने खोली निर्वाचन आयोग के दावों की पोल।

निकाय चुनाव भले ही शांतिपूर्ण संम्पन्न हो गये हो लेकिन मताधिकार का प्रयोग न कर पाने के कारण पूरे प्रदेश के हजारों मतदाताओं को घोर निरासा हाथ लगी है। लोकतंत्र के पर्व को मनाने का मतदाता को कभी कभी ही मौका मिलता है,और अगर वह मौका भी उसके हाथ न लगे तो निराशा होनी लाजमी है।
वैसे तो हर बार के चुनाओं में यह घटना सामने आती है, वोटरों के मतदाता सूची में नाम गायब मिलते है लेकिन इस बार तो निर्वाचन आयोग ने हद ही कर दी जब 9 साल की बच्ची का नाम वोटर लिस्ट में डाल िंदया और पुरे मौहल्ले के नाम सूची से गायब कर दिये।
यह आरक्षण का प्रभाव कहें या हमारी शिक्षा व्यवस्था की खामियां जहां बीएओं को इतना पता नही की 9 साल की बच्ची को वोट देने का अधिकार है या नही। गलतियों का आलम यह रहा कि 25 साल के युवा की उम्र 65 साल और 65 साल के बुर्जूग की उम्र 28 साल दर्ज है, जबकि रोहन का नाम मोहम्मद नासिर लिखा गया है, तो मोहम्मद नासिर का नाम मोहन सिंह कर दिया गया। और होगा भी क्यों नही जब योग्य व्यक्ति की जगह आरक्षण के सहारे 40 प्रतिसत अंक वाला अयोग्य व्यक्ति ले लेता है। तो वह अनपढ़ों वाले काम ही तो करेगा।
दूसरा पक्ष यह हो सकता है निजी फायदे के लिए एक पार्टी दूसरे की वोटिंग लिस्ट को विगाड़ने का काम कर रहे है।राजनीति का चेहरा वर्तमान समय में इतना गंदा हो चुका है कि निजि फायेदे के लिए कोई भी किसी भी हद तक जा सकता है। बहरहॉल पक्ष-विपक्ष का आरोप प्रत्यारोप तो लाजमी है। लेकिन इतने हद तक लापरवाही होने लगे कि पूरे प्रदेश के मतदाता परेसान हो जाय यह निश्पक्ष चुनाव नही कहा जा सकता है,बल्कि यह लोकतंत्र में मतदाता का उत्पीडन कहा जाय तो अतिश्योक्ति नही होगी।
-भानु प्रकाश नेगी,देहरादून